"अस्तित्व के कसूरवार"
ये आंखों में आसू है या काजल का पानी,
ये आंखों में आंसू है या काजल का पानी,
ये पैरों में पायल है या किसी बंधन की निशानी,
ये जो हाथों में कंगन खनक रहे हैं या है ये लकड़ियों के गुज ।।।
ये जो मेरे माथे की बिंदिया सिंदूर है,
क्या है यही मेरे माथे की लकीरें ,
या है क्या यही फिर मेरे जीवन की भूल।।।
एक ख्वाबों की नजर से देखा था हकीकत का जहां,
एक ख्वाबों की नजर से देखा था हकीकत का जहां,
ख्वाबों की दुनिया हंसीन-सी थी,
मगर हकीकत की जहा ने तो मार ही डाला।।।
जब सजे थे मंडप होठो पर गुमनाम हसी-सी थी ,
और दिल में ना जाने कौन-सा डर ,
जो पूछ रहे थे सवार कि , .
ये जो, .
मेरे हाथों में मेहंदी के रंग हैं , .
या थी वो , .
मेरे हाथों की रेखा, .
जब किस्मत की लकीरों और मेहंदी के रंग को देखा,
जब किस्मत की लकीरों और मेहंदी के रंग को देखा,
मेहंदी के रंग पर ऐतबार किया, .
फिर इक ऐसे मंजर में खुद से सवाल किया, .
की थी क्या यह मेरे सुहागन होने की निशानियां, .
और मेरे सपनों की तरह नए जीवन की शुरुआत
या मेरे अस्तित्व के अंत के कसूरवार???