इक न इक रोज़ तो रुख़सत करता
मुझ से कितनी ही मोहब्ब्त करता
सब रुतें आ के चली जाती हैं
मौसम ए ग़म भी तो हिजरत करता
भेड़िए मुझको कहाँ पा सकते
वो अगर मेरी हिफ़ाज़त करता
मेरे लहजे में ग़ुरूर आया था
उसको हक़ था कि शिकायत करता
कुछ तो थी मेरी ख़ता वरना वो क्यों
इस तरह तर्क ए राफ़ाक़त करता
और उस से न रही कोई तलब
बस मेरे प्यार की इज़्ज़त करता
परवीन शाकिर