किराया
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हम इन्सानों की जिन्दगी का सफ़र भी बडा कमाल का है
हवा पानी खाने को भोजन सभी सुख सुविधाओ के साधन और सर छुपाने के लिये छत कितना कुछ चाहियें होता है इस जिन्दगी को जीने के लिये l
परिंदे तो तिनका तिनका जोड सर छुपाने को एक छोटी सी छत बना लेते है और खुशी खुशी जीबन यापन करते हैं l
पर हम इन्सानों को जितनी जगह मिल जाये कम है l
जगह ना हो तो किराये के मकान मे रहता है और किराया भरता है l
जगह मिल जाये तो छोटा बडा मकान बनाता हैं और फिर किराये की जगह टेक्स भरता है l
देखा जाये तो आप किराये के मकान मे रहो या खुद का घर बना कर किराया तो आपको देना ही देना है फिर चाहे आप उसे किराये के रूप मे दे या टेक्स के रूप मे l
बेसे देखा जाये तो हमारा शरीर भी एक किराये के मकान की तरह ही है अगर हम इस शरीर का खयाल ना रखे, इसे भोजन पानी ना दे तो शरीर भी हमारी आत्मा को शरीर से बाहर कर देता हैं किसी मकान मालिक की तरह ही l जैसे रेंट (किराया) ना मिलने पर मकान मालिक मकान से बाहर कर देता है l
किराया (रेंट) शब्द सुनने मे टीक टाक लगता है पर होता बड़ा खर्चीला है l इस संसार में एसे अनगिनत लोग हैं जो किराए के मकानों मे रहते है और इस किराये की मार को सेह रहे है l कोई दूसरे शहरों में नौकरी की मजबूरी मे , कोई उच्च पढाई के लिये दूसरे शहरों ,हॉस्टलों या फिलेटों मे रहता है और किराया भरता है l
इस किराये से कोई भी अछूता नही है l
- RJ krish... ✍️