आज एक और बरस बीत गया उसके बगैर
जिसके होते हुए होते थे जमाने मेरे
अहमद फ़राज़
चेहरे से झाड़ पिछले बरस की कुदूरतें
दीवार से पुराना कैलेंडर उतार दे
जफर इकबाल
देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फैज
एक ब्राह्मण ने कहा है कि यह सब अच्छा है
मिर्जा गालिब
दुल्हन बनी हुई हैं राहैं
जश्न मनाओ साले नौ के
साहिर लुधियानवी
एक लम्हा लौट कर आया नहीं
यह बरस भी राईगां रुखसत हुआ
इनाम नदीम
एक अजनबी के हाथ में देकर हमारा हाथ
लो साथ छोड़ने लगा आखिर यह साल भी
हफीज मिरठी
एक साल गया एक साल नया है आने को
पर वक्त का अब भी होश नहीं दीवाने को
इब्ने इन्शा
जिस ब्राह्मण ने कहा है कि यह साल अच्छा है
उसको दफनाओ मेरे हाथ की रेखाओं में
क़तील शिफ़ाई
कौन जाने के नए साल में तु किसको पढे
तेरा मेअयार बदलता है निसाबों की तरह
परवीन शाकिर