मैं जट यमला पगला दीवाना
हो रब्बा इत्ती सी बात ना जाना
के के के, ओ मैनू प्यार करती है
साडे उत्ते ओ मरदी है
उसने तो कहा हर बात को इशारे में
दीया भी जला के रखा रातों को चौबारे में
रेशमी दुपट्टा फेंका पींग के हुलारे में
मेले में अकेले बीच बाज़ार सारे में
कौन सा बनाया न बहाना, बहाना,बहाना
मैं जट यमला पगला...
ऐसा नहीं होता तो वो ऐसे शरमाती ना
मुझे आते देख सड़क पे भाग जाती ना
ज़ुल्फ़ों के घूँघट में मुखड़ा छुपाती ना
छोटी सी उमर में वो जान को लगाती ना
प्रेम का रोग पुराना, पुराना, पुराना
मैं जट यमला पगला...