" अब मां ही नहीं "
मां छाल एक पेड़ की घिसकर लगातीं थी,
वो जख्म सूख जाता वो जिस पर लगातीं थी।
वो छाल अब लगाता हूं पर राहत मिलती नहीं मुझे,
मां छाल के संग ममता भी घिस कर लगाती थी मुझे।
मैले फटे कपड़े मेरे जब धोने लगती थी,
मुख देखकर मेरा उदास होने लगती थी।
झुंझलाती मेरी जिद पर पीटती तो थी मुझे,
मैं रोता तो मां भी मेरे संग रोने लगती थी।
कभी रोटी पकती तो सब्जी नहीं होती,
कभी चावल मिल जाते तो दाल नहीं पकती।
मां खुद भूखी रहती पर मुझे प्यार से खिलाती,
अब रोटी सब्जी दाल चावल है पर अब मां ही नहीं।
आज सब बिते दिन याद आ रहे हैं "मित्र" को,
मैं जिद तो करना चाहूं मगर अब मां ही नहीं।
✍️मनिष कुमार "मित्र" 🙏