खाली पन का बाजार जगा जगा पर मौजूद है ।
फर्क इसी बात का है की किसीका मौन है तो किसी का मशहूर ।
पर ये भी बहोत लहिज अहसाह है करना झरूर
इसका भी अलग ही रुतबा है , जनाब
शोर और अल्फ़ाज़ तो समय समय पे बदलते रहते है
खालीपन और खामोशी तो ठहराव के पन्ने है
जिस दिन ये पन्ने खुलेंगे उस दिन
वख्त तो क्या है पूरा दौर ठहरजायेगा।