स्मरण रहे की चाहे कितने भी ग्रंथ, कितनी भी किताबें, कितनी भी भाषाएं, कितना भी ज्ञान प्राप्त कर लो, आप कभी अपने माता पिता से उपर नहीं हो पाओगे।
तोह बार बार अपने माता पिता के सामने अपने तथाकथित ज्ञान की मूर्खता पेश करके उन्हें ये पछतावा मत होने दे की उन्हें ऐसी संतान मिली है जो ना संतान बन सकी और ना ही उनके जीवनकाल में किये गए अथाग परिश्रम का योग्य परिणाम।