जियो और जीने दो
श्री एस. के गुप्ता (93 वर्ष) मध्य रेल्वे से मुख्य सिगनल एवं टेलीकाम इंजीनियर के पद से सेवानिवृत्त होकर अब फाऊंडेशन फार एक्सीलेन्स यू.एस.ए के फेसीलिटेटर के रूप में सेवाएँ दे रहे है।
मेरे विचार में संसार में कोई भी प्राणी मृत्यु के लिये नही परंतु सुखपूर्वक जीने के लिये जीवन व्यतीत करता है। मैं इतनी उम्र के बाद भी अभी भी जीवित रहकर समाज सेवा हेतु समर्पित रहना चाहता हूँ। जीवन यदि ईमानदारी और अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित रहते हुये जिया जाये तो अत्यंत सुखदायी हो सकता है। मृत्यु एक स्वाभाविक प्रक्रिया हैं और उसके विषय में सोचना ही नही चाहिए क्योंकि हमारा मृत्यु पर कोई नियंत्रण नही है।
मैं अपने परिजनों के व्यवहार, प्रेम और समर्पण से पूर्ण संतुष्ट हूँ परंतु वर्तमान समय में लडकियाँ उच्च शिक्षा प्राप्त कर शादी के बाद भी काम करना चाहती है इससे एकाकी परिवार का वातावरण बनता जा रहा है। आज बच्चे अपने बुजुर्ग माता पिता को छोडकर अपने भविष्य को उज्जवल बनाने हेतु विदेशो में बस गए है। इससे बुजुर्ग अकेले रह जाते है और वृद्धावस्था में कुटुंब जनों के सहारे से वंचित हो रहे है। वह अकेले जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर है। मैं अपने शेष बचे जीवन में गरीब बच्चों को पढ़ाई हेतु मदद करना चाहता हूँ।
मेरी सरकार से अपेक्षा है कि प्रतिवर्ष सैंकड़ों लोग उच्च पदों से सेवानिवृत्त होकर अच्छी पेंशन पाते है। उनमें से प्रायः सभी रिटायर होने के पश्चात अपना शेष समय सेवा कार्य में व्यतीत करना चाहते है परंतु उन्हें कोई भी मार्गदर्शन प्रदान करने वाला नही है। देश की राष्ट्रीय व प्रांतीय सरकार को इनकी उच्च शिक्षा व अनुभव का पूरा लाभ जनहित हेतु उठाना चाहिए ताकि नवोदित लोग इनसे लाभान्वित हो और इनके समय का भी सदुपयोग हो सके। मेरी युवाओ से अपील है कि हमें हर कार्य के लिये केवल समाज व प्रशासन पर निर्भर नही रहना चाहिए। हमें अपनी काबिलियत के अनुसार सरकारी व निजी क्षेंत्रों में प्रयास करना चाहिए। मैं पुनर्जन्म में विश्वास नही करता, हमारे अच्छे व बुरे कर्मों का फल इसी जन्म में किसी ना किसी रूप में मिल जाता है। हमें आजीवन समाज और देशहित के प्रति समर्पित रहना चाहिए।