अब लड़कियाँ गुड़ियों से नही खेलतीं, उनका ब्याह नही रचातीं, उन्हें सजाती-संवारती भी नही हैं और न ही खुद के ब्याह के सपनों से इतराती हैं। फफूंद लगे दोहाथे पर रोती भी नही और न रौब के दीमक से सिहरती हैं।
बुनती नही अब वो फन्दा-फन्दा अपने उधड़े रिश्ते के दुशाले का और बची हुई कतरनों से नही सीतीं सबकी खुशियों का जामा।
रजाई में छुप कर अब वो नही हँसती, जोरदार ठहाकों से डरती नही हैं।
जाग पड़ी हैं लड़कियाँ बहकावे की नींद से और नही सोतीं वो अब किसी के फुसलावे पर। थकती नही हैं वो अब मीलों दौड़ने से, जान गयीं हैं ठहराव की सड़न।
कूदना भी आता है उन्हें बाड़े से बाहर। धड़कती नही हैं वो लाचार सी खड़ी-खड़ी और न पहनती हैं मौन रहने का पारम्परिक लिबास।
लड़कियाँ अब थोड़ा बेशर्म हो गयीं हैं।
छाया अग्रवाल