*उसका उजड़ा शहर*
आँखों के समन्दर को
पलकों में छुपाये
सिसकता हुआ मौन
चटखाने लगा था
धधकती दीवारों को
और बिखरी हुई हवायें
हथेली में
उठाने की जुगत
लगाता है
उसका उजड़ा हुआ शहर
जब से मिला है मुझे
चाह ने फैला दी हैं अपनी बाँहें
विस्तृत कर दिया है
अपने आगोश का दायरा
और पढ़ने लगा है
उसके उजड़े हुये शहर की
खामोश तस्वीर
छाया अग्रवाल