Hindi Quote in Poem by Chaya Agarwal

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अपना समुन्दर

न जाने कौन सी रग को
तोड़ दिया है तुमने
कि अब प्यास जगती ही नही है
लाख चाहतों का सफर
याद दिला दूँ इस मन को
और उन लम्हों को सटा लूँ
करीब से
जहाँ बंधनों को तोड़ कर मैं
अविरल सी बही थी
हर पत्थर को गिराती, समझाती
बस चली जा रही थी
नयन अभिराम
टिके थे तुझ पर
मगर तुम वहाँ थे ही नही
मैं सूख कर रेतीली सी होती गयी
जहाँ तुम्हारें पाँव जलने लगे
और तुम फिर तलाशने लगे
बहती हुई नदी
जिसे तुम सुखा कर रेतीली बना सको
या जीत सको
अपनी भटकी हुई पिपासा
मैं रेतीली होकर तड़पती रहूँ
ये न कर सकूँगी
अब नव अंकुर फूटेगें
तृप्त कर देंगे
पीड़ा के रक्त खण्ड़ो को
तब मैं बन जाऊँगी
जीवन दायिनी उन अंकुरों की
फिर से बहेगा निर्मल प्रवाह
इस बार मैं छोड़ दूँगी
पिछले पथरीले रास्तों को
और जीत लूँगी
अपना समुन्दर
छाया अग्रवाल
बरेली
मो. 8899793319

Hindi Poem by Chaya Agarwal : 111331016
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