My New Poem ...!!!!
मेरे ख्वाबों की बस्ती मे ये कैसा मंज़र नजर आया हैं.....
की हर शक्ल पे जाने कैसा अजीब-सा ख़ौफ़ नजर आया हैं ".......…
रिश्तों की शूली पे आपसी यक़ीनों का मातम छाया है*......
हर मासूम-से चेहरों पर भयानक मुखौटों का साया है *......
इन्सान आदमीयत से ख़ौफ़ज़दा हो कर टकराया हैं *.....
टेक्नोलॉजीकी ईज़ादोंसे एतबारो का गला घुटता नज़र आया है*....
अनदेखी अनजानी-सी सऩाखत की शमशीरों ने बेहद खुन बहाया है ....
जिस्म लरजते “रुँह” काँपती, बस्तीया बिरान-सी नज़र आई है *.....
प्रभुजी की भी ख़ुद अपनी क़िस्मतें लिखने वाली कलम सेहमी-सी नज़र आई है *....!
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