एक ख्वाब अधूरा सा
सागर की तरह
बहती जिंदगी में
कभी कभी आता है
ज्वार भाटा खयालों का
और रेत की तरह
फिसलते समय पर
तुम्हारी यादों के
पदचिन्ह उभरने लगते हैं
कहीं दूर उसी समय
पेड़ पर बैठी एक चिड़िया
चहकती है
और
मेरी कलम कुछ शब्द
बिखेर देती है
कुछ स्वरलहरियाँ
बिखर जाती हैं
हवाओं में
जलतरंग बज उठता है
फिजाओं में
जब लिखती हूँ अपना नाम
याद आ जाता है
छोड़ा हुआ तुम्हारा उपनाम
हमारे दरम्यां पसरी
वो अंतहीन खामोशी
भीगी रातों की तह में
जमे कुछ भूले हुए किस्से
शबनम से भीगे
अहसासों के हिस्से
बहुत सी बातें
जो तुम कहते रहे
बिना समझे दर्द
जो हम सहते रहे
एक कसक सी होती है
गीली दूब पर
सर रखकर सोती है
मेरे बचपन की गुड़िया
और सपनों की परियाँ
हम क्यों बंट गए
'हम' से 'मैं' और 'तुम' हो गए
तुमने रोका नहीं
मैंने टोका नहीं
राहें जुदा हो गयीं
और खुशी खो गयी
धूप को देखकर
चाँदनी सो गयी
ख्वाब देखा जो था
मुक्कमल न कर सके
हम मीत तो बने
मनमीत न बन सके..!
©डॉ वन्दना गुप्ता
मौलिक
(24/11/2018)