My New Poem...!!!!
अमल की डगर पे जिसकी नीति अच्छी
बे-शक जीवनके हर कार्यों में उन्नति उसकी
मैं श्रेष्ठ हूँ माना यह आत्मविश्वास है
लेकिन बस मैं ही श्रेष्ठ हूँ यह अहंकार है
विफलता पड़ाव है सफलता की राह का
चलित मन किए बग़ैर चले,तो फ़ल क़रीब है
मस्तिष्क 🧠 अंग छोटा भले ही हो,चेतना
संचार माध्यम आदान-प्रदान मध्य-बिंदु हैं
जीवन-पथके हर मोड़पे चेता चेतावनी देती
तीन बार,बहकता वही जो अनसुनी करता है
मस्तिष्क के ख़्यालों का भी अजीब रुझान है
पल भर में फ़ासले बरसोंके तय कर लेते है
रवानी-ए-लहूँ में पैवस्त हो यही ख़्याल,एक ☝️आग़ाज़,ज़हनमें तामीरसे पहले करते है
चाहें एंफील टावर, लिबर्टी हो या ताजमहल
हक़ीक़त बननेसे पहले ख़्याल में पेदा होते है
कौन समजा है रहस्य क़ुदरत के बनाए इस
मिट्टीके ढाँचे के इन्सानी पुतलोंकी हस्ती का
ग्रहों, चाँद सितारों की चाल से परखते तो है
आने वाले कल पर खुद में बसे प्रभु से है दूर
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