नोंक-झोंक
मधुजी एक सोशल वर्कर हैं... पर्सनाल्टी थोड़ी कॉम्प्लिकेटेड है.. कभी नर्म नर्म.. कभी सख्त सख्त.. टाइप की.. वैसे वो निर्भीक महिला है... रफ़ टफ भी कह सकते हैं.. खाना और सोना उनके प्रिय शगल कहे जा सकते हैं.. भूख और नींद पर कंट्रोल नहीं होता... दो बेटियां हैं... सात और आठ साल की.... मनी और सोना... वे कहती हैं.. बेटियाँ ही मेरी धन दौलत हैं..
इसके ठीक विपरीत उनके पति चंद्रशेखर जी सॉफिस्टिकेटेड कहे जाने वाले समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं.. एक अनुशासन पसंद व्यक्ति... जिसे घर हमेशा साफ सुथरा व्यवस्थित चाहिए... हर चीज उसकी जगह पर करीने से सजी हुई...
अब हुआ यूं कि एक दिन मधुजी समाज सेवा कर लौटी तो देखा घर एकदम अव्यवस्थित.. उनके वार्डरोब की आधी साड़ियां बेड पर बिखरी पड़ी हैं और दोनों बेटियाँ दीवार की और मुँह करे कान पकड़े खड़ी हैं... पति महाशय सोफे पर आधे पसरे मोबाइल में बिजी...
"क्या हुआ?? तुम दोनों ऐसी क्यों? किसने पनिश किया? बाई कहाँ है?? उनके मुखारविंद से सवालों की बौछार सुन पिता की गुस्सैल नजरों को अनदेखा कर सोना मनी माँ से लिपट गयीं।
"क्या सिखाया तुमने बेटियों को..? पूरे घर की ऐसी की तैसी कर दी.. साड़ियां पहनी जा रही हैं.. ये तरीका है खेलने का.." बाई के नहीं आने से एक दिन बेबी सिटिंग क्या करनी पड़ी पति का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया।
"हाँ तो क्या हुआ?? बच्चियां हैं.. हमारी साड़ियां हम रख लेंगे तह करके.. ये कोई तरीका है.. इतना टोकोगे तो दब्बू बन जाएंगी.." मधुजी ने पलटवार किया... "आपको घर प्यारा है, मुझे बेटियाँ..."
बात इतनी बढ़ी कि चंद्रशेखर जी बोले... "ये मेरे बाप का घर है तुम निकल जाओ यहां से.."
"अच्छा तो क्या बाप का घर अपना होता है..."
"हाँ.. और ये मेरे बाप का घर है.. तुम्हारे नहीं..."
अब मधुजी तेवर दिखाती हुई बोली... "तो ठीक है... तुम्हारे पिताजी तो स्वर्ग सिधार गए .. ये सोना मनी के बाप का घर है... तुम निकलो यहाँ से.... ये दोनों रहेंगी अपने बाप के घर में और इनकी केअर टेकर के रूप में मैं...."
परिणाम यह हुआ कि दोनों ही खिलखिलाकर हँस पड़े।
©डॉ वन्दना गुप्ता
मौलिक