My New Poem...!!!!
मेरी मोहब्बत का वो एहतराम न कर सका।
बिछङते वक्त वो एक सलाम न कर सका।
नम आँखे, थरथराते लब, काँपता वो बदन
सब बयाँ करके भी वो कलाम न कर सका।
ऐसे टूट के चाहने को मै कहू भी तो क्या
एक पाक रिशता वो सरेआम न कर सका।
बिकी हसरते , हुआ व्यापार भी इश्क़ का
एक गरीब इस को नाकाम न कर सका।
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