वे लोग पढ़ें जो इन दिनों मुझसे निराश हुए हैं और मजबूरन मुझे अनफ़्रेंड कर रहे हैं।
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जब लोग सड़कों पर मारे जा रहे हों, दोस्तों के परिवार से फोन आये की तुम दिल्ली में रहते हो मेरे बेटे को कुछ दिन अपने पास रख लो। भइया कहने वाले लड़के रोते हुए फोन करें कि भइया पुलिस ने मारा है जबकि हम तो सिर्फ सड़क किनारे खड़े थे। मेरे दोस्त और उनके परिवार भय के माहौल में हों, एक नेत्रहीन दोस्त की छाती को पुलिसवाले बूटों से कुचलें। भगवा पहनने वाला मुख्यमंत्री बदला लेने, सबक सिखाने की भाषा बोल रहा हो, लाखों का सूट, डिजाइनर कुर्ते पहनने वाला प्रधानमंत्री खुद को फ़क़ीर बता रहा हो। माफ करना, माफ करना दोस्त ऐसे माहौल में मैं तुकांत जोड़कर गीत लिखने की ग़द्दारी नहीं कर सकता अपने लिखने से, नहीं लिख सकता भौंडे गीत प्रेमिका की तारीफ में या सरकार के नपुंसक समर्थन की भाषा में।
वो लिखें जिन्हें अटल जयंती के कवि सम्मेलन पढ़ने हैं, मुझे अपने लोगों के साथ खड़े होना है।
मेरा कोई दावा नहीं कि मैं सौ प्रतिशत सही हूँ, लेकिन हां मैं अपने हिस्से के सच के साथ अपनी औकात भर खड़ा हूँ।
धन्यवाद।