उन दिनों तूफान बहुत गहरा था
इतना गहरा की,हाथ को हाथ सुझाई
नहीं दे रहा था
इतना गहरा की बहते आसूॅं ,
बर्फ बनकर आॅंखों से लटक रहे थे
तमाम रोशनियाॅं बुझ चुकी थी
अक्ल के पन्नों पर रेत थी
बर्फ और रेत दोनों
एक साथ एक जगह
दिखना बंद हो चुका था
रेत बंवडर बना रही थी
जिसमें जिस्म की शक्ल का मन ढस चुका था
ऐसे तूफानों से निकल कर
कोई सलामत रह जाने पर दुआ करता है
तो कोई खुद को टटोलता है
ये देखने के लिए कि कितना
साबुत है वो
पर सब ऐसा नहीं करते , कुछ तूफानों
में खोए हाथों के लिए दुआ करते हैं
कुदरत से सवाल करते हैं
रुह से रूबरू होते हैं
खोये हाथों की निशानी ढूॅंढते हैं
ढूॅंढते हैं फिर कई सवालों को
हाथ अगर गुम होने को था
तो था क्यो?
गुलाब के पौधों से पूछते हैं
कि कोई उसके होने कि निशानी दे
जो गुम हो गए हैं तूफान में
कई कई दिन तक नउम्मीदी में
दुआ करते हैं खोने वाले कि शिकायत
करते हैं
मैंने भी अंधेरों में दुआ की
तब मुस्कराते दो गुलाबों ने
कुछ टूटी उम्मिदे जोड़ी
पर फिर भी मेरी कपड़े की
तुरपन का धागा टूटा था
मैं आँखो में पानी के साथ
मुस्कुराती और दर्द को
कुत्ता कहती ।
कुत्ता सबसे वफ़ादार होते हैं
जो सब छूटने पर भी नहीं
छोड़कर जाता।
मैं वफ़ादार के साथ रहती थी
इस ख्याल से ,गुलाब कभी झूठ
नहीं बोलते….