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“सच बोलते बोलते, लब थक से गए हैं, झूठी दुनिया के नकाब, हर दिल पे लगे हैं। सच की राह में, कांटों से भरे हैं रास्ते, हर एक कदम पे, छल के मिले हैं वास्ते। दिल ने हर बार, सच का दिया साथ, मगर दुनिया ने समझा, इसे एक गलत बात। सच बोलते बोलते, जख्म गहरे हो गए हैं, दुनिया के इस खेल में, हम अकेले रह गए हैं।”
“शब्द आजाद है, लेकिन मेरी कहानी नहीं, हर एक लफ्ज़ में छुपी है एक न सुनाई जाने वाली कहानी। एक समय था जब लफ्ज़ों का सरमाया था, हर बात कहने का हक़ और हिम्मत पास था। मगर अब हालात कुछ ऐसे बदले, कि लफ्ज़ तो हैं, पर उन पर पहरे हैं कई। जब दिल टूटा, तो शब्द भी बिखर गए, आंसुओं के सैलाब में गुम होकर रह गए। जिन हर्फ़ों में कभी प्यार का रंग था, आज उन्हीं में दर्द की परछाई है। कहने को सब कुछ है, पर जुबां खामोश है, शब्द आजाद हैं, पर उनका कोई जोश नहीं है। हर एक बात दिल में दबा कर रखी, क्योंकि सुनने वाला अब कोई अपना नहीं है। वक्त ने वो जख्म दिए, जो बयान नहीं हो सके, शब्दों ने चाहा बहुत, पर दर्द हल्का नहीं हो सके। हर दिन जी रहा हूँ मैं इस उम्मीद में, शायद कोई समझे मेरी इस दर्द भरी नज़्म को। शब्द आजाद हैं, पर मन बंधनों में है, दिल के जख्मों को अब कोई मरहम नहीं है। हर एक लफ्ज़ में छुपी है एक सिसकती आवाज़, शब्द तो आजाद हैं, मगर दिल में एक कैद का राज़।”
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