ग़ज़ल
🌸गुप्तगू🌸
नज़रे हटाकर मुझसे कुछ गुफ़्तगू आज कर,
तोड़कर सारे झिझक अपनी मुझसे भी तकिया कलाम कर।
मैं कौन सा भला तेरा दुश्मन हूँ, सच न सही बेफुजूल ही कुछ बात कर,
कैसी शर्म हया समेटी हो आँखों में, मन से न सही बेमन ही कुछ सवाल कर।
मैं भी कहाँ जानकार हूँ मोहब्बत के रस्मों का, कुछ मैं करूँ कुछ तू भी शुरुआत कर,
सिलसिला मोहब्बत का सुना है बातों से चलता है, कभी धूप कभी छाँव होने का एहसास कर।
क्यों हिचकिचाहट भरी है तेरे कदमों में, थोड़ा मैं चलूँ थोड़ा तू चलने को तैयार कर,
मंज़िल आ जायेगा करीब एक दिन सनम, धैर्य मै रखा हूँ थोड़ा तू भी इंतज़ार कर।
✍️बेनी सागर