कितना निश्चल, निर्मल है,
कल-कल बहता तेरा जल।
इन पत्थरीले पथ पर तुम,
कैसे चलती कोमल तल।
बहती जाती, बढ़ती जाती,
दुग्ध मेखला-से वस्त्र तुम्हारे,
कितने सुंदर अस्त्र तुम्हारे,
रक्त प्रवाह-सी नस-नस में तुम।
सह लेती हँस-हँस कर तुम,
हर बाधा को अपनाती हो;
तन यौवन की देहरी पर,
मन तेरा अब भी बालक ।
चंचल, चतुर, खेल-खेल में,
चुपके से भर देती बादल।
कभी धरा पर आने को,
होती कितनी व्याकुल तुम;
अनजाने में घर-आँगन,
खलिहानों में भर देती जल।
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