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✍️ हिन्दी कविताशीर्षक: पटरियों की गूँज कवि विजय शर्मा Erry 1.लोहे की लकीरें फैलीं दूर तलक, जैसे जीवन की राहें अनगिनत शक। हर सीटी में छिपा है कोई संदेश, पटरियों की गूँज है समय का परिवेश।2.स्टेशन मास्टर की आँखों में धुंधली यादें, बीते सफ़र की परछाइयाँ और सादें। हर गाड़ी के संग उठता है सवाल, कहाँ ले जाएगी ये पटरियों का जाल।3.सीमा और अरुण की धड़कनें मिलतीं, प्लेटफ़ॉर्म पर सपनों की डोरें खिलतीं। दूरी के पार भी दिलों का संग, गूँजती पटरियाँ बनतीं प्रेम का रंग।4.मजदूरों की हथेलियाँ कठोर और थकीं, पसीने से भीगीं, पर उम्मीदें रचीं। उनकी मेहनत से ही चलती है गाड़ी, गूँज में छिपी है उनकी जीवन गाथा सारी।5.गाँव में आया व्यापार और उजियारा, रेल ने दिया शिक्षा का सहारा। सपनों को शहर तक पहुँचाया, पटरियों ने गाँव को नया रूप दिलाया।6.पटरियाँ दो दिशाओं में जातीं, भविष्य और अतीत को साथ निभातीं। हर सफ़र में बदलतीं रिश्तों की दूरी, गूँज में छिपी है जीवन की पूरी।7.तूफ़ान की रात जब स्टेशन काँपा, बिजली की गड़गड़ाहट ने सबको झकझोरा। पर पटरियों की गूँज ने दिलाया भरोसा, जीवन की राहें देतीं साहस का परोसा।8.अरुण ने सीमा से वादा निभाया, पटरियों की तरह रिश्ता अटूट बनाया। दूरी चाहे कितनी भी हो सामने, गूँज रहेगी प्रेम की हर दामन में।9.मजदूरों ने फिर से पटरियाँ सँवारीं, तूफ़ान के बाद उम्मीदें सँभालीं। उनकी मेहनत ने साबित किया यही, जीवन की गाड़ी नींव से चलती सही।10.रामलाल की आँखों में आँसू थे, पर मुस्कान भी उनके होंठों पे थे। उन्होंने समझा — गूँज कभी ख़ामोश नहीं होती, पटरियाँ हर पीढ़ी को जोड़ती रहतीं।11.हर सीटी में छिपा है कोई गीत, हर गूँज में है जीवन का संगीत। पटरियाँ सिर्फ़ लोहे की लकीरें नहीं, ये समय की गूँज हैं, जो रुकती कहीं।12.कहानी का अंत एक विचार से होता, पटरियों की गूँज कभी ख़ामोश न होता। ये जोड़तीं दिलों को, सपनों को, राहों को, जीवन की गूँज बनातीं हर चाह को।🌟 सारयह कविता “पटरियों की गूँज” को जीवन, प्रेम, संघर्ष और समय की प्रतीकात्मकता से जोड़ती है। इसमें स्टेशन मास्टर की यादें, युवा प्रेम की धड़कनें, मजदूरों की मेहनत और गाँव का बदलाव सब मिलकर रेल की पटरियों को जीवन का रूपक बना देते हैं।
मौत का छोटा रूप — विजय शर्मा Erry मैं एक दिन शोक-सभा को जा रहा था, मन बोझिल था, कदम धीमे-धीमे बढ़ रहे थे। रास्ते में देखा एक टेम्पो वाला, अपने ही वाहन में गहरी नींद सो रहा था। साँसें उसकी बहुत हौले-हौले चल रही थीं, चेहरे पर अद्भुत शांति का डेरा था। क्षण भर को लगा जैसे समय ठहर गया हो, जैसे संसार से उसका कोई नाता न रहा हो। आगे बढ़ा, जहाँ मृत्यु ने दस्तक दी थी, वहाँ भी एक देह बिल्कुल वैसी ही पड़ी थी। वही शांत चेहरा, वही बंद पलकें, बस एक अंतर था—साँसों की डोर टूट चुकी थी। तभी मन ने मुझसे धीरे से पूछा, "क्या सचमुच मृत्यु इतनी अलग होती है?" फिर भीतर से उत्तर आया— "नहीं, यह तो नींद की अंतिम सीमा है।" हर रात जब हम सो जाते हैं, अपने अहंकार को कहीं खो जाते हैं। न धन याद रहता, न पद का अभिमान, न कोई अपना, न कोई पराया इंसान। हर दिन एक छोटी मौत हम मरते हैं, फिर सुबह नया जीवन लेकर उठते हैं। कल की थकान, कल के सपने, सब रात की चादर में कहीं छिप जाते हैं। यदि हर सुबह नया जन्म है, तो हर शाम मृत्यु का एक अभ्यास है। फिर क्यों इतना अभिमान करें, जब जीवन स्वयं एक प्रवास है? जिस दिन अंतिम नींद आ जाएगी, कोई अलार्म हमें जगा न पाएगा। सिर्फ कर्मों की सुगंध साथ चलेगी, बाकी सब यहीं रह जाएगा। इसलिए जीना है तो ऐसा जीओ, कि हर रात निश्चिंत होकर सो सको। और जब अंतिम निद्रा आए, तो मुस्कुराकर उसे भी गले लगा सको। क्योंकि मृत्यु कोई दुश्मन नहीं, वह जीवन का अंतिम विश्राम है। जो हर रोज़ छोटी मौत को समझ गया, उसी ने जीवन का सच्चा अर्थ जाना है।
पितृ दिवस पर पिता को समर्पित (1) आज पितृ दिवस का पावन दिन, श्रद्धा के दीप जलाता हूँ, अपने पिता के चरणों में, मन के सुमन चढ़ाता हूँ। जिनकी बदौलत जीवन पाया, सपनों को आकार मिला, उनके त्याग और तप से ही, खुशियों का संसार मिला। (2) जब भी जीवन की राहों में, घोर अँधेरा छा जाता था, पिता का साहस बनकर सूरज, हर संकट को हर जाता था। उनकी बातें दीपक बनकर, मन का पथ आलोकित करतीं, टूटे हुए विश्वासों में भी, नई उमंग संचारित करतीं। (3) अपने हिस्से की धूप समेटे, हमको शीतल छाँव दी, काँटों भरी डगर पर चलकर, हमको फूलों की राह दी। उनकी मेहनत के पसीने ने, घर की किस्मत लिख डाली, अपने अरमानों की कीमत पर, बच्चों की झोली भर डाली। (4) पिता कोई शब्द नहीं है, जीवन का आधार हैं, घर की मजबूत नींव हैं वे, खुशियों का भंडार हैं। उनकी आँखों में छिपे हुए, कितने अनकहे सपने होते, बच्चों की मुस्कानों में ही, उनके सारे अपने होते। (5) जब दुनिया ने ठोकर दी, तब पिता ने हाथ थाम लिया, हार के क्षण में भी मुझको, जीत का सच्चा नाम दिया। उनके अनुभव की छाया में, हर उलझन आसान हुई, उनकी सीखों से ही मेरी, जीवन राह महान हुई। (6) उम्र की धूप ने चेहरे पर, झुर्रियों के फूल खिला दिए, लेकिन बच्चों के प्रति प्रेम ने, मन के दीप जला दिए। आज भी उनकी आँखों में, वही पुराना प्यार दिखे, समय बदल जाए चाहे, उनका स्नेह अपार दिखे। (7) आज के इस शुभ अवसर पर, बस इतना सम्मान करें, जीते जी अपने पिता का, दिल से हम गुणगान करें। जो हाथ पकड़कर चलना सिखलाएँ, उनका मान बढ़ाएँ, उनकी सेवा और आदर से, जीवन को धन्य बनाएँ। (8) हे ईश्वर! हर पिता के जीवन में, खुशियों का उपहार रहे, उनके चेहरे पर सदा ही, मुस्कानों का श्रृंगार रहे। पितृ दिवस पर नमन हमारा, हर उस पिता के नाम रहे, जिसके त्याग और प्रेम से, जग में जीवन धाम रहे। ✍️ विजय शर्मा ऐरी
🌸 Mother's Day — माँ के नाम माँ ❧ — १ — जब भी थकान ने आँखें मूँद लीं, माँ की लोरी ने नींद सजाई थी। अँधेरे में जो दीप जलाया था, वो माँ की ही उँगली थी, वो माँ की ही रोशनाई थी। माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी। — २ — आँचल में जो सुकून मिला करता था, वो दुनिया के किसी कोने में नहीं मिलता। झुलसती धूप में छाँव बनी रही, माँ का प्रेम हर मौसम में खिलता। माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी। — ३ — जब पाँव लड़खड़ाए राहों में, माँ की दुआ ने थामा हर बार। गिरने से पहले हाथ थे तेरे, माँ, तू ही मेरा हर आधार। माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी। — ४ — रोटी में तेरे हाथों की महक थी, भोजन नहीं, वो प्रेम का भोग था। दुनिया के हर स्वाद से ऊपर, माँ के हाथों का अपना ही योग था। माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी। — ५ — जब रोया मैं चुपके-चुपके रात को, तू बिन बोले पास आ जाती थी। आँसू पोंछने को शब्द नहीं चाहिए, माँ की नज़र सब कुछ जान जाती थी। माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी। — ६ — तूने कभी शिकायत न की ज़िन्दगी से, हर तकलीफ़ को मुस्कान में ढाला। त्याग को तूने नाम नहीं दिया, बस चुपचाप हर पल को सँभाला। माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी। — ७ — तेरी झुर्रियाँ मेरी कहानी हैं माँ, हर लकीर में मेरा बचपन छुपा है। तेरे सफ़ेद बालों में देखता हूँ, मेरे लिए जो तूने सब कुछ चुका है। माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी। — ८ — देव मंदिरों में ढूँढा ईश्वर को, पर वो तो घर में ही मिलता रहा। माँ के चरणों की धूल जो है, हर तीर्थ से वो पावन निकला। माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी। — ९ — दूर हूँ आज, पर दिल में है तू, हर साँस में तेरी दुआ बसी है। जहाँ भी जाऊँ, जो भी पाऊँ, माँ, तेरी ममता मेरे साथ चली है। माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी। — १० — शब्द कम पड़ते हैं तुझे कहने को, सागर भी कलम बने तो कम होगा। माँ, बस इतना जान ले — तेरे बिना यह जीवन सूना, अधूरा, धुंधला होगा। माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी। — कवि Vijay Sharma Erry विजय शर्मा 'एरी' Mother's Day — 2026 🌸
--- उठते सागर विजय शर्मा एरी उठते सागर, गरम होती धरती, भीषण तूफ़ान, चेतावनी स्पष्ट दी… रोते हिमखंड, उनकी चुप्पी गूँजती, पिघलते आँसू, लहरों में बदलती। जलते वन, आकाश धुँधला, प्रकृति का गीत अब शोक में ढला। नदियाँ घुटतीं, सूखी ज़मीन, पक्षी उड़ते, पर ठिकाना कहीं नहीं। काँपते नगर, सागर किनारे हटते, मानव का अहंकार अब हार चखते। बच्चों की आँखें मुरझाए प्रभात पर, हरियाली के सपने खो गए रात भर। फिर भी आशा साँसों में पलती, परिवर्तन के बीज धरती में खिलती। साथ मिलकर उठें, साथ मिलकर खड़े हों, धरती को सँवारें, उसके घाव भरे हों। --- यह हिंदी कविता अंग्रेज़ी मूल की भावनाओं को उसी गहराई और चेतावनी के स्वर में प्रस्तुत करती है, साथ ही अंत में आशा और सामूहिक प्रयास का संदेश देती है।
--- प्रकाश ही प्रकाश विजय शर्मा एरी I. अंधेरों में जब जीवन था, सन्नाटा हर क्षण गहरा था। फिर कोई आया मधुर उजाला, मन में खिल उठा नया उजाला। II. मुस्कान उसकी वसंत समान, स्वर में छिपा मधुर गान। निशब्द क्षणों में आशा जन्मी, थका हुआ मन फिर से संवरी। III. न कोई आडंबर, न कोई शोर, बस करुणा का निर्मल भोर। सुनने वाला धैर्य भरा, निकट रहे तो जग सुधरा। IV. टूटे दीवारों पर साहस लिखा, गिरते पलों में संबल दिया। जहाँ संदेह का शासन था, वहाँ विश्वास का आलोक रहा। V. दबी हुईं आशाएँ फिर उठीं, बादलों में ताराएँ झिलमिलीं। हर कदम हुआ हल्का-सा, मानो सृष्टि संग चल पड़ा। VI. उसकी उपस्थिति ने दिखलाया, मन में छिपा बल जगाया। सत्य का दर्पण सामने आया, भूला हुआ सौंदर्य फिर पाया। VII. यात्रा चाहे मुड़े, झुके, उसका प्रकाश सदा थामे। समय, नियति चाहे बदल जाए, स्नेह का उपहार साथ निभाए। VIII. आज मैं खड़ा हूँ पूर्ण, नया, कृतज्ञता का गान रचा। उसके आने से जीवन बदला, नीले गगन सा मन उजला। ---
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