मैं और मेरे अह्सास
कहाँ जा रहे हैं हम?
कहाँ जा रहे है हम मंज़िल का पता ही नहीं l
निकल तो पड़े है रास्तों का पता भी नहीं ll
सारी उम्र रिश्ता बनाने को भागते रहे हैं कि l
अनजानी डगर पर पहचाना सा कही नहीं ll
थोड़ी सी खुशियों से दामन को भरने को l
बहुत बार ऊल्लू बन चुके है अभी नहीं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह