मैं और मेरे अह्सास
दाग
दिल पर लगे दाग मिटाये नहीं मिटते हैं l
जुदाई वाले दिनरात काटे नहीं कटते हैं ll
एक टीस चौबीसों घंटे चुभती रहती हैं l
रंजो गम का आलम बाटे नहीं बटते हैं ll
दिल बहलाने आये थे दोस्तों के साथ l
महफ़िल में लम्हें घटते नहीं घटते हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह