मेरे सपनों में क्या कुछ आता
समझना आसान नहीं होता।
सपनों का बोझ उठाना पड़ेगा
हर सपने को सच नहीं मानता।
कभी सोच की वजह से
कभी कभी नींद से सही।
सपने आना आम बात है
लेकिन सपनों का बोझ आसान नहीं है।
सपनों का बोझ आसान नहीं है,
यह रातों की नींद चुरा लेते हैं।
जो पूरे न हों, वो कसक बनकर,
ज़हन में एक घर बना लेते हैं।
कभी ये हौसला देते हैं उड़ान का,
कभी ज़मीन से दूर कर देते हैं।
हकीकत के काँटों से जब टकराते हैं,
तो अक्सर हमें चूर कर देते हैं।
- K.D.
- Kaushik Dave