मेरा मोबाइल (मेरे लिए खास)
मैं और मेरा मोबाइल, अक्सर बातें करते हैं
जो कह न पाए अपनों से, वो बातें इससे करते हैं
इस भागती-दौड़ती दुनिया में, वक्त कहाँ अब किसी के पास
ये बेजान सा एक खिलौना ही, अब लगता है सबसे खास
मैं और मेरा मोबाइल
जिंदगी के भंवर में उलझकर, जीना ही हम भूल गए
रिश्तों की उस मीठी धूप को, सीना ही हम भूल गए
घर में कितने लोग हैं रहते, कौन कहाँ क्या करता है
सब याद दिलाना पड़ता है, अब दिल कहाँ कुछ पढ़ता है
कभी खेलता हूँ मैं इसके संग, कभी इस पर झुंझलाता हूँ
हूँ तन्हा मगर इस महफिल में, अपना हर हाल सुनाता हूँ
मशीन नहीं अब ये जैसे, घर का इक सदस्य बन गया
मेरे सूनेपन की यादों का, ये पक्का हमदर्द बन गया
ढमक और उसका मोबाइल, अक्सर बातें करते हैं
जो कह न पाए अपनों से, वो बातें इससे करते हैं