मौत तो देह का अंत है,
पर स्त्री की हाय...
आत्मा की थकान से और रूदन से जन्म लेती है।
जब वह प्रतिदिन अपने भीतर
थोड़ी-थोड़ी मरती है
और फिर भी संसार के सामने
जीवित होने का अभिनय करती है,
तब उसकी हाय प्रार्थना बनकर
ईश्वर के चरणों तक पहुँचती है,
बिना शब्दों के, बिना शिकायत के।
ईश्वर स्त्री की हाय को कभी बद्दुआ नहीं मानते,
वो उसे कर्म का लेखा समझते हैं।
जहाँ अन्याय होता है,
जहाँ सहनशीलता को कमजोरी समझा जाता है,
वहीं से उसका दण्ड रूपी फल
धीरे-धीरे आकार लेने लगता है।
न तुरंत, न प्रत्यक्ष,
पर अचूक।
क्योंकि जो पीड़ा मौन में सह ली जाती है,
वो समय के गर्भ में न्याय बनकर पलती है।
स्त्री की हाय,
किसी का विनाश नहीं चाहती,
वो तो संतुलन चाहती है।
वो चाहती है कि,
जो बोया गया है, वही लौटे।
मौत एक बार को क्षमा हो सकती है,
पर स्त्री की हाय...
ईश्वर का मौन हस्तक्षेप है—
जो देर से सही, पर अन्याय को
उसके ही भार से झुका देता है।
दण्डित कर देता है...!!