कह दिया उसने – कब तक इलाज कराऊँगा,
काश कोई पूछे… ये बीमारी क्या मैंने खुद लिखी है अपनी किस्मत में कहीं?
इलाज मजबूरी है, कोई शौक नहीं मेरा,
तानों में दबकर भी जीना पड़ता है हर रोज़ सवेरा।
लाचार हूँ इसलिए हाथ फैलाना पड़ता है,
वरना किसी को भीख बनकर जीना अच्छा नहीं लगता है।