सुनो ऐ खुशियों!
क्यों घूमती रहती हो तुम बनकर खानाबदोश
क्यों नहीं टिककर बैठती तुम किसी एक ठौर।
चलो कुछ दिन, नहीं कुछ साल तो तुम मेरे साथ बिताओ
हां मानती हूं, मैं एक अच्छी मेहमाननवाज नहीं
फिर भी कोशिश रहेगी मेरी पूरी
कि रहे ना तुम्हारी सेवा में कोई कोर कसर ।
खाने पीने और मनोरंजन के साधनों से
जब तुम लगोगी उकताने और ढूंढने लगोगी
मेरे घर से विदा होने के बहाने,तब मैं तुम्हें
अपनी लिखी कविता और कहानियां पढ़ाऊंगी।
कितनी शिद्दत से तुझे चाहा,एक एक हर्फ समझाऊंगी ।
यकीं है मुझको कि पढ़कर अपने बारे में मेरे जज़्बात
तुम छोड़ कर मेरा साथ, फिर और कहीं ना जा पाओगी ।
लेकिन सुनो सखी! मैं इतनी भी खुदगर्ज नहीं
जो तुम्हें बांधकर रखूं, हमेशा के लिए अपने साथ।
तुझ पर तो है हक सबका, सबकी है तू जागीर
भरी रहे तुझसे सबकी झोलियां,वो राजा हो चाहे फकीर।
सरोज प्रजापति ✍️
- Saroj Prajapati