एक बड़े मकान पर एक रिक्शा चालक सवारी लेने आया था।
वह कब से मकान के बहार बैठा बैठा मकान से सवारी बहार आए उसका इंतजार करता था।
वह मकान बहुत बड़ा था,मकान के उपर एक तख्ती पे बड़े अक्षरों में लिखा था "पितृ कृपा"।
ड्राईवर देख ही रहा था, तब मकान से एक वृद्ध को एक बस्ते के साथ रखने एक लड़का आया।
वृद्ध को देखने पर लग रहा था वह बहुत दुःखी हें, उसकी आंखों के भीतर छुपे अश्रु बता रहे थे।
लड़का ओटो के पास आकर ड्राईवर को किराया देकर बोला इनको आनंद वृद्धाश्रम छोड़ देना।
ओटो वाला देखता रहा और कर भी क्या सकता था?
उसने उस वृद्ध को ओटो में बिठाया और वृद्धाश्रम की तरफ ओटो को ड्राइव किया।
वृद्ध जातें जातें उस घर पर बनी तख्ती देख रहा था।
ड्राईवर सब समझ गया था फिर भी मन में एक प्रश्न परेशान कर रहा था इतने बड़े मकान पर बड़े अक्षरों से पितृ क़पा लिखा था फिर भी वृद्ध का यह हाल?
वृद्ध आदमी बोला: बेटा वह घर मेरे पिताजी ने बनाया था।
बस मुझे वह तख्ती कुछ यादें स्मृतियों में वापस ला रही है।
मुझे आज इस बात का दर्द नहीं हैं कि में अपने घर से दूर जा रहा हूं।
मुझे दर्द इस बात का हो रहा है कि अब वह तख्ती वहां ज्यादा दिन ना रहे तो अच्छा है क्युकी उसका लड़का भी बड़ा हो रहा है।