सजल
समांत----
पदांत-आना
मात्रा भार-16
(चौपाई छंद)
सोते को है सरल जगाना।
पर जगते को कठिन उठाना।।
जीवन दाँव लगाया फिर भी।
मात-पिता का लुटा खजाना।।
बरगद बनकर छाँव बनाई।
चिड़िया उड़ती सुना बहाना।।
उँगली थामे बड़े हुए पर।
सबल पैर का नहीं ठिकाना।।
उमड़-घुमड़ कर आँसू सूखे।
पर मुखड़े को है हर्षाना ।।
प्रश्न चिन्ह तब लगा हुआ है।
कैसा आया नया जमाना।।
संस्कृति और सभ्यता रूठी।
जागो मानव क्यों पछताना।।
मनोजकुमार शुक्ल 'मनोज'