हर रोज़ लड़ रहा हूं होके मैं बे ख़बर।
हर रोज़ रेत के जैसे कोई फिसल रहा।
हर रोज़ रात होती है दिन के तले मगर।
हर रोज़ एक एक पांव कोई है चल रहा।
हर रोज़ एक जंग शराफत से चल रही।
हर रोज़ तसव्वुफ की इबादत मचल रही।
हर रोज़ एक रोज़ रकीब आयेंगे कहकर।
हो जाता हूं। सब सोच कर मैं फिर से बे ख़बर।
-Anand Tripathi