पता है, तुम वादे ऐसे किया करते थे जैसे पूरी दुनिया छोड़ सकते हो, पर मुझे कभी नहीं छोड़ोगे।
तुम्हारी बातों में इतना यक़ीन था कि लगता था, सारी दुनिया गलत हो सकती है...
लेकिन तुम नहीं।
ऐसा मेरा मानना ही नहीं, मेरा यक़ीन था।
मैंने तुम्हें अपने भरोसे की सबसे ऊँची जगह पर रखा था, इतनी ऊँची कि कभी-कभी तुम्हें खुदा से भी ऊपर मान बैठा।
मुझे लगता था कि अगर सब कुछ टूट भी जाए, तो तुम्हारे वादे मुझे थामे रखेंगे।
पर शायद मुझे नहीं पता था कि सबसे ज़्यादा चोट वहीं से लगती है जहाँ हम सबसे ज़्यादा भरोसा करते हैं।
फिर एक-एक करके सारे वादे टूटते गए, सारे भ्रम बिखरते गए, और मैं बस खड़ा देखता रह गया-उस भरोसे को, जिसे बनाने में साल लगते हैं
और टूटने में बस एक पल।
आज भी कभी-कभी यही सोचता हूँ-जिसे मैंने खुदा के ऊपर रखा, जिसे अपनी दुआओं से भी ज़्यादा माना, क्या उसका ऐसा करना सच में बनता था?
या गलती मेरी ही थी, जो मैंने एक इंसान को अपनी दुनिया का खुदा बना लिया।