कान्हा,
मैंने भी एक "पाप" किया है- मैंने प्रेम किया है।
तुमने तो गंगा दी इस संसार के पाप धोने को, पर क्या एक और गंगा नहीं दे सकते उस प्रेम के लिए जो भीतर ही भीतर मुझे खाए जा रहा है?
यह कैसा पाप है,
माधव-
जो किसी को चोट नहीं देता, पर करने वाले को ही तोड़ देता है।
अगर हो सके तो एक ऐसी गंगा बना दो, जहाँ मैं डुबकी लगाऊँ और यह अधूरा प्रेम,
यह अनकही पीड़ा सब धुल जाए...
मेरे भीतर का यह बोझ बह जाए, और मैं फिर से हल्का हो सकूँ।