*पुरुषार्थ का उद्घोष*
तंद्रा तज कर जो जाग उठा, वह अभ्युत्थान का राही है,
भाग्य-लेख को जो मिटा सके, वही कर्म का साक्षी है।
मृग-मरीचिका के पीछे वह, कभी न अपना समय गँवाता,
श्रम-सीकर से अपनी वह, अमिट नियति लिख जाता।
बाधाओं का संवर्तक बन, जो गिरिवर को भी झुकाता है,
शून्य से जो सृजन करे, वही विश्वकर्मा कहलाता है।
कर्मठता की उस वेदी पर, जब 'आशीष' का दीप जलता है,
तब भाग्य का वह मौन पत्थर भी, संकल्प-ताप से पिघलता है।
न थकता है वह काल-चक्र से, न प्रारब्ध का रोना रोता,
अथक साधना के बीजों को, वह मरुथल में भी है बोता।
अतुलित बल का वह पुंज है, संकल्प जिसका अविचल है,
तपस्या की उस पावन भट्टी में, तपकर बनता वह कुंदन है।
Adv. आशीष जैन
7055301422