एक रात ऐसी आएगी,
जब मैं एक-एक बात लिखूँगा—
न जज़्बात की कोई चाशनी होगी,
न झूठ का कोई सहारा लूँगा।
मैं कागज़ पर तेरे गुनाहों को,
पूरे सबूतों के साथ लिखूँगा।
उस रात अदालत मेरी होगी और गवाह मेरी तन्हाई,
हर फ़ैसला... सिर्फ और सिर्फ मेरे हक़ में होगा।
और तब...
बिना किसी नकाब के, बिना किसी पर्दे के,
तुझे, तेरे नाम के साथ...
ज़माने भर के लिए ‘बेवफ़ा’ लिख दूँगा।