मैं तो अपने किरदार में ही रहना चाहता था, सीधा-सा, सादा-सा, बिना किसी बनावट के... मगर कम्बख़्त ये ज़माना हर रोज़ मुझसे एक नया मुखौटा माँगता रहा।
मैं सच बोलता तो लोग "अकड़" कह देते, चुप रहता तो "घमंड" समझ लेते, रो पड़ता तो "कमज़ोर" बना देते, और हँसता तो कहते "इसे क्या फर्क पड़ता है।"
धीरे-धीरे मैंने आईने में अपने ही चेहरे से ज़्यादा वो नक़ाब देखना शुरू कर दिया जो दुनिया को पसंद आता था।
अपने जज़्बातों को जेब में रखकर दूसरों की उम्मीदें ओढ़ ली मैंने।
मैं अच्छा इंसान बना रहना चाहता था, मगर लोग चालाकी की तारीफ़ करते हैं। मैं सच्चा रहना चाहता था, मगर यहाँ झूठ ही सबसे सुरक्षित हथियार है।
अब थक गया हूँ हर किसी को खुश करते-करते, हर रोज़ खुद से हारते-हारते... क्योंकि जो मैं हूँ वो किसी को चाहिए नहीं, और जो सबको चाहिए वो में बन नहीं पा रहा।
काश एक दिन ऐसा भी आए जब मुझे फिर से "मैं" बनने की इजाज़त मिले... बिना किसी डर के, बिना किसी मुखौटे के, बस अपने किरदार में जैसा मेरी तक़दीर ने मुझे बनाया था।