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Fictional world

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@shoaibshoaib151991


वक्त कहता है कि तू इंतजार कर
इन पत्तों की तरह गिर कर शाखाओं से
अपने आप को आजाद कर।
न देख कि ये जुदा हुए हैं अपने वजूद से,
तू देख गिरकर आए हैं ये अपने रूप में।

जब दर्द हो जो बिछड़ने से बढ़ जाए
तो पत्तों की खूबसूरती को अपना जो तुझको सिखाए,
कि दर्द के बाद ही मिलती है आजादी,
न देख या सोच इतना कि तू दर्द में हीं बस जाए।

तू रंग दे अपने आप को अपने आसमान से,
जैसे पत्ते गिरकर रंगते हैं हवाओ में बहकर आसमान को,
तू निकल घर से जैसे पत्ते उड़ते हैं नई ऊंचाइयों पर,
कदम बढ़ाएगा, तभी तो पहुंचेगा आसमान के क्षितिज पर।

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शरीर नहीं दिल थक चुका है,
आसूं नहीं आंख थक चुकी है।
पर नाउम्मीद का घर जो दिल
में बस गया है, उम्मीद एक कोने
में छुपी बैठी है, कि मेरा भी वक्त
आएगा लेकिन शायद उसे नहीं
पता कि वक्त ने दुख के साथ
हाथ मिलाया है और सुख को
बस कुछ लम्हे ही दिए हैं ।
- Fictional world

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