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करना तो चाहते थे हम भी बहुत कुछ मगर किस्मत ने ना कुछ करने दिया तड़पते रहे सारी उम्र अकेले हमको ना ज़िन्दगी ने मरने दिया "विशाल"
गमो की धूप मे भी मुस्कुरा कर चलना पड़ता है... इस दुनिया में तो चेहरा सजा कर चलना पड़ता है..!! इस ज़िन्दगी में मिलती है बहुत सी ठोकरें यहां रोशनी को भी रास्ता दिखा कर चलना पड़ता है
गीता है हिन्दू की सिख की बाणी है बाइबिल ईसाईओं की मुस्लिम की कुरान है खुदा हैरान है खुदा हैरान है "विशाल" (पूरी ग़ज़ल पढ़ने के लिए कमेंट करें)
कौन अपना हुआ है इस ज़माने की दौड़ में मौत मंज़िल होती है परवाने की दौड़ में यहाँ घूम रहे है भेड़िये इंसान-ए-लिबास में हम लगे हुए है दिया जलाने की दौड़ में आलिम बैठ गए है चुप करके अपने घरों में जाहिल लगे हुए है बात मनवाने की दौड़ में कुछ पिलाना चाहते हो अमृत पिलायो सबको लग ना जाना कहीं ज़हर पिलाने की दौड़ में हम तो "विशाल" सीधा दिल ही चुराते है हम नहीं लगे कभी नज़र चुराने की दौड़ में "विशाल"
जानवरों की तरह काटे जा रहे है लोग ना जाने किस ज़माने में रह रहा हूं मैं अब तो सहमा सा रहता हूं हर घड़ी बेशक अपने आशियाने में रह रहा हूं मैं "विशाल"
ज़माने के दर्द को जो बांट देते है वो शख़्स आम नहीं शायर होते है दुख दर्द मजबूरी तन्हाई हिजर गम हर रोज़ खून से चेहरे को धोते है "विशाल"
अजब रंग देखा है मैंने इस ज़माने में फरक मिलता नहीं अपने बेगाने में "विशाल"
कुछ मजबूरी और कुछ जिंदगी ने दबा दिया मुझको इस गरीबी और बेबसी के हाथो मरवा दिया मुझको "विशाल"
एक अरसा हो गया है अब तेरे बिन हैरान हूं कभी लम्हा ना निकलता था
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