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कच्चा घर कच्चा घर था, छोटा सा, पर अपना-सा, सच्चा सा। दीवारों में प्यार बसा, माँ का आँचल, छाया-सा। छत टपकी बरसातों में, हँसते थे हम रातों में, बर्तन रख-रख भूल गए, दुख क्या है उन बातों में। टूटा-फूटा, साधारण था, फिर भी सबसे न्यारा था, कच्चा घर वो मिट्टी का, दिल से बहुत हमारा था… 🌧️
“मन की हर धड़कन में बसे हो तुम, हर साँस में नाम तुम्हारा है। राधे-श्याम की इस प्रेम धारा में, जीवन सारा हमारा है। 💙” - Narayan Mahor
ठहराव की छाया कभी-कभी दुनिया बहुत तेज़ भागती है, जैसे किसी अदृश्य मेले में सबको जल्दी पहुँचना हो। सड़कें थक जाती हैं, पैर धूल से भर जाते हैं, पर लोग फिर भी चलते रहते हैं— मानो रुकना कोई भूल हो। ऐसे ही एक मोड़ पर एक बूढ़ा पेड़ खड़ा है। वह किसी से कुछ नहीं कहता, बस छाया बिखेरता रहता है। जो भी थोड़ी देर रुकता है, उसे हवा धीरे से समझाती है— कि सफ़र केवल चलना नहीं होता, कभी-कभी ठहरना भी रास्ता होता है। और तब लगता है कि जीवन कोई दौड़ नहीं, बल्कि एक लंबी पगडंडी है जहाँ हर कदम के साथ मन भी थोड़ा-सा घर लौटता है।
छोटा सा सपना आँखों में, शब्दों की छोटी नाव। कागज़ पर बहती रहती है, मन की हर इक छाव। कभी हवा से बात करे, कभी बादल से खेल। कभी दर्द को गीत बना दे, कभी खुशियों का मेल। धीरे-धीरे शब्द जुड़ेंगे, बन जाएगी राह। एक दिन दुनिया पढ़ेगी, तुम्हारे मन की चाह।
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