DASTAN-E-KARB भ्रम से परे क्या है? in Hindi Drama by Azoorey books and stories PDF | DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 4 Scene 6

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DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 4 Scene 6

शाम ग़मग़ीन थी। महल में उदासी का सन्नाटा फैला हुआ था। बादलों की गरज की गूंज चारो तरफ़ चक्कर लगा रही थी, और अम्मा साहब अपने कमरे में आराम कर रहीं थी तभी सुरूर ने आकर शेख़ बाबा के आने की ख़बर पहुंचाई। 
शेख़ बाबा अंदर आकर दीवान पर बैठ गए

"इतना परेशान क्यों नज़र आ रहे है बाबा?" अम्मा साहब ने पूछा

"मैंने कुसुम को इक़ामतगाह की तरफ़ भेजा था, जिस वक़्त से लौटी है गुमसुम सी है। इस वक़्त वो जल्दी सोती नहीं है। मुझे लगता है उसे उसकी मां याद आ रही हैं।" बाबा ने बताया

"उसने कुछ बताया क्या हुआ है?"

"कुछ भी नही।"

"कोई था उसके साथ?"

"नहीं, मैथिली वही पर रहती है मुमकिन हो उसे कुछ मालूम हो।"

सुरूर उनकी बात सुन कर फ़ौरन इशारा समझकर मैथिली को लेने चली गई। उसके बाद अम्मा साहब ने शेख़ बाबा से कहा
"मुझे भी कुछ बातें करना था आपसे।"

"कहीए।"

"सुबह के बाद ज़य्यान बिलकुल चुपचाप हो गया है, ख़ाने की मेज़ पर भी नही आया था।" 

दोनों इस बात से बख़ूबी वाक़िफ थे की अहलम अपने छोटे भाई की किस क़दर चाहती है और उससे ज़्यादा ज़य्यान चाहता है उसे इसलिए इस वक़्त दोनो समझ रहे थे की ज़य्यान पर क्या बीत रही होगी, अम्मा साहब ने आगे कहा

"मुझसे वो नही संभाला जाएगा, उसे आप ही समझाएं बाबा।"

"हम्म्म मैं करूंगा उनसे बात। पर इस बारे में राएद को इत्तिला हुई?"

"वो अभी तक लौटा नहीं है।"

"आपने मुझे बुलवाया?" दरवाज़े पर से मैथिली की आवाज़ ने उनका ध्यान अपनी तरफ़ कर लिया, वो दरवाज़ा खटखटाकर कमरे में दाख़िल हो गई

"शाम के वक़्त कुसुम इक़ामतगाह की तरफ़ गई थी तुम्हे कोई इत्तिला है इस सिलसिले में?" शेख़ बाबा ने पूछा

"मैने उसे हया के कमरे की तरफ़ जाते देखा था। मैं बावर्चीखाने की तरफ़ जा रही थी तभी मैने उसे जाते देखा था उसके बाद क्या हुआ मुझे नही मालूम।"

"अच्छा! ठीक है तुम जाओ।" मैथिली चली गई। उसके जाते ही अम्मा साहब ने पूछा

"हया महल आ गई है?"

"जी। मेरी मुलाक़ात भी हुई उससे, वो बेहद सुलझी हुई और हस्सास है।" शेख़ बाबा ने बताया

"उसने कोई बात किया?" 

"आपसे मिलने का मुतालबा किया था।" 

"मेरी ज़िम्मेदारी बड़ी है। इसमें उस बच्ची का कोई कुसूर नहीं, मुझे हर हाल में इंसाफ ही करना है।" 

"आप उससे मिलने को तैयार हैं?"

"मुझे उसकी बात सुनना चाहिए।" 

"हम्मम, मैं कुसुम की तरफ़ चला जाता हूं, आप उससे मिल लिजिए।" 

शेख़ बाबा ने रुक्मिणी को हया को लाने का हुक्म दिया और कुसुम की तरफ़ चले गए

रुक्मणि हया के साथ ऐवान-ए-सद्र पहुंच गई। हया घबराई हुई जुस्तुजू में थी की आख़िर अम्मा साहब ने इस वक़्त उसे क्यों बुलवाया होगा।

"अम्मा साहब।" रुक्मिणी ने कहा, अम्मा साहब ने हया को देखा

"बैठो।" अपने सामने दीवान पर इशारा देकर उन्होंने कहा। वो सिमट कर बैठ गई

"इसका अंदाज़ बिल्कुल वैसा ही है जैसा बाबा ने बताया।" अम्मा साहब ने उसे देखकर सोचा

"देर हो गई तुम्हारी ख़बर लेने में।"

"नहीं।" हया ने उनका मान रखते हुए जल्दी से कहा "आप यहां की हुकमरान है, आपको तो मेरी गुस्ताख़ी के लिए मुझे नजरंदाज़ करना चाहिए, जाने अनजाने में जो ख़ता मेरे भाई से हुई है उसकी वजह से आपको मुझे नज़रंदाज़ करना चाहिए।..मैं इस बर्ताव के क़ाबिल नहीं।" उसका लहजा नर्मपोश था

"तुम ग़लती पर नही हो इसलिए तुम ख़ुद को गुनहगार मत मानो, महल में तुमसे कोई बेज़ार नही है।"

"आप ख़ुदा के लिए मुझपर ये ज़्याक्ती न करें, आप आली मुक़ाम हैं और मैं आवाम की एक मामूली ज़ात जिसका वजूद महज़ डॉक्टर हम्ज़ा की बहन से ज़्यादा नही।.. और ख़ता भी हमारी तरफ़ से फिर भी मैं गुनहगार नहीं?"

"क्योंकि यही हक़ीक़त है, तुम इसमें ज़र्रा बराबर भी शामिल नहीं हो इसलिए ख़ुद को इस वजह से हलकान मत करो और तुम मीरास महल की ज़िम्मेदारी बनकर आई हो और यहां अपने फ़र्ज़ से मुंह नहीं मोड़ा जाता, न ही उनके साथ नइंसाफी होती हैं। इसलिए अब तुम बेफिक्र हो जाओ।" 

"आपलोगों के रहते मुझे क्या फिक्र हो सकती है। शेख़ बाबा ने मेरे आते ही ख़ुद को मुझसे वाक़िफ़ कर लिया था और अब आप के दिल में भी परवाह ही है। अब मुझे कोई बात परेशान नहीं करेगी। यहां सबकुछ अलग है।" 

"मैं चाहती हूं तुम महल के अंदर बेफ़िक्री से रहो।" 

"जी।" 

"अब तुम जाओ आराम करो।" वो रुक्मिणी के साथ चली गई, और कुछ देर बाद एक खादिमा अम्हेल के साथ 
ऐवान-ए-सद्र आ गई।

"बड़ीमां, आपने मुझे याद किया था?" 

"आओ बैठो।" उन्होंने कहा "शाम से महल में बहुत खामोशी से हो गई है। कुसुम की तबियत भी कुछ ठीक नहीं है, बाबा भी परेशान हैं। तुम कुसुम से बात करके मालूम करो क्या हुआ है, वो शायद तुमसे बात करे।" 

"उसने मुझसे कहा था उसे मां याद आ रही हैं और फिर मुझसे नज़्म सुनने की ज़िद भी किया, उसके बाद वो ख़ामोशी से लौट गई।" अम्हेल ने बताया

"हम्मम, और तुम! तुम भी कुछ मायूस नज़र आ रही हो?" अम्हेल को देखकर उन्होंने पूछा

"ऐसी बात नहीं है।"

"मुझे मालूम था हमेशा की तरह कुछ ऐसा ही कहोगी तुम।क्या तुम मुझे अपना हाल बताना नही चाहती। तुमने क्या अभी तक महल को अपना नही माना?" 
अम्हेल का महल में जो हाल था, और उसका तकल्लुफ़ उन सबको मद्दे नज़र रखकर उन्होंने ये सवाल मुनासिब समझा

"ऐसी बात नहीं है। आप ही हमें यहां लेकर आईं, यहां हमें सबसे ज़्यादा अपनापन मिला, दिलासे मिले, और ये आज़ादी भी आपलोग की परवाह की वजह से ही मिली हमें, और मेरी तालीम भी आपके ज़रिए पूरी हो रही है। आपने तो इसे मेरा घर बना दिया है फ़िर हम इस महल को अपना कैसे नहीं मानेंगे।" 
अम्हेल अम्मा साहब को यक़ीन दिलाने लगी की वो यहां की दरो-दीवारों से आशना हो चुकी है 

"तो बताओ, फिर तुम क्यूं इतनी बुझी बुझी रहती हो? क्यों अपनी परेशानियां नहीं बताती हो?"

"मेरे मन में ऐसी कोई बात नही है।" उसने सुलझे अंदाज़ में जवाब दिया

"तुम्हे देखकर मुझे अपने दिन याद आ जाते हैं। जब मैं इस महल में आई थी मेरा भी कुछ ऐसा ही हाल रहता था, और तब बाबा ने मुझे बहुत संभाला था, और मुझे भी बिल्कुल ऐसे ही तालीम दिया था जैसे तुम्हे देते हैं।" फ़िर उन्होंने पूछा "तुम जानती हो न?"

"जी।"

"फिर तुम्हें ऐसा क्यों लगता है की मुझे मालूम नही तुम किन उलझनों में घिरी हुई हो?"

पहले अम्हेल ने उन्हें देखा फिर नर्मी से कहा 
"हम नहीं चाहते है इतनी उलझनों में आपकी परेशानियां और बढ़ जाएं।"

"तो क्या तुम्हारे नज़दीक मैं मुश्किलों से लड़ने के क़ाबिल नहीं?"

"हमारा ये मतलब हरगिज़ नहीं है।" उसने जल्दी से कहा "हम वाक़ई अपको बेवजह परेशान नहीं करना चाहते।"

"सुबह....तुमने जो किया सबके हक़ में अच्छा किया, बहुत हिम्मत दिखाया तुमने, उस वक़्त मैं तुम्हे देखकर हैरत में पड़ गई थी, उस वक़्त तुम तुम नही लग रही थी।"

ठंडी सांस खींचकर फिर उन्होंने कहा "उस सूरते हाल में तुम्हे जो मुनासिब लगा तुमने वही किया। मीरास महल तुम्हारा शुक्रगुज़ार है इसलिए उस वजह से ख़ुद को बेचैन मत करो जिसमें तुम्हारी ग़लती नही थी। महल में तुम ख़ुद मेरे साथ, मेरी मर्ज़ी से आई हो, और मैं किसी भी हाल में नहीं चाहती की तुम्हे महल की वजह से किसी भी तरह का नुक़सान पहुंचे इसलिए मैं तुम्हे मुसीबतों में पड़ने की इजाज़त नहीं देना चाहती थी। लेकिन शायद किस्मत को।कुछ और मंज़ूर था।" 

"आपके होते हुए कौन सी मुसीबत हमें छूकर गुज़र सकती है। हमने जिस रोज़ से महल में क़दम रखा मुहब्बत और परवाह के सिवा कुछ नहीं मिला है, ऊन बीते मौसमों में सभी ने अपना लिया है हमें, ऐसा बिल्कुल महसूस नहीं होता की हम इनसे अलग हैं।"

"तुम अभी तक अस्ल महल से वाक़िफ़ नहीं और मैं चाहती भी नहीं तुम हो।" उन्होंने सोचा

कुछ पल ख़ामोशी से उसके चेहरे की तरफ़ निगाह किए अम्मा साहब ने कहा 

"तुम्हारे नाम जो ख़त आया है उसका क्या मतलब है?" अम्मा साहब के सवाल पर अम्हेल उन्हें हसरत से देखकर घबरा गई, उसके मन में बीती सुबह कि की हुई दुआ फिर से घर करने लगी मगर हर बार ज़रूरी नही की हर दुआ क़ुबूलियत पर पहुंचे। उसकी चुप्पी पर अम्मा साहब ने दुबारा सवाल किया

"क्या मेरे सवाल का जवाब नही तुम्हारे पास, क्या मुझे बताओगी नहीं? ऐसा क्यों की बार बार तुम घबरा जाती हो?" उसके अंदर चल रही उलझनों को भांप कर उन्होंने उसकी वजह जानना चाहा

"मैं चाहती हूं तुम मुझे दुबारा ख़त पढ़कर सुनाओ।" 

अम्मा साहब की मर्ज़ी से कौन इंकार कर सकता है इसलिए अम्हेल भी रुआसा होकर ख़त पढ़ने लगी

"मेरी बहन
मुझे माफ़ कर देना, तुम्हे शाहबाद छोड़कर हवेली आने के बाद एक बार भी मैं पलटकर तुम्हारा हाल जानने न आ सका। मैं आना चाहता था मगर तुम्हारे यहां से जाने के बाद हवेली की बहुत सी ज़िम्मेदारीयां मुझपर है जिसे मुझे संभालना ही है। तुम्हे जिस दिन से तुम्हारी जगह से बेदख़ल किया और मजबूर किया उसे छोड़ने पर उस दिन से आवाम हवेली से नाराज़ रह रही है। मैंने उन्हें हर तरह से संभालने की कोशिश किया मगर हक़ीक़त उनके सामने आ गई, लेकिन उनमें से कुछ लोग अभी भी तुम्हारे कहे पर ही यक़ीन करते है। अब तो भाई भी ज़्यादातर हवेली के कामों के सिलसिले में ख़ुद ही कस्बे से बाहर रहते है, उनकी ग़ैर मौजूदगी में अम्मीजान और माहम का ख़्याल रखना मेरी ज़िम्मेदारी है।

हां मुझे याद है मैंने कहा था मैं किसी से नहीं बताऊंगा तुम हवेली से कहां गई हो और मैने नहीं बताया है। अब मुझे कुछ फुर्सत मिल गई है इसलिए मैं दो-चार दिन बाद माहम के साथ तुमसे मिलने छोटी दरगाह आऊंगा। मुझे नजाने क्यों बहुत कुछ बिखरता नज़र आ रहा है। इसलिए तुम मुझसे ज़रूर मिलना ताकि मैं तुम्हे हवेली का सारा हाल बता सकूं मुझे यक़ीन है इन मसलों का हल तुम्हारे पास ज़रूर होगा।"

उसके ख़त पढ़ लेने के बाद भी अम्मा साहब ख़त के अल्फाजों को अपने ज़हन में तराशने लगीं और अम्हेल चुपचाप बैठ गई।

वो जानती थी इस दफ़ा वो हरगिज़ इस लम्हे से बच के बाहर नहीं निकल सकती इसलिए उसे अबकी बार किसी भी तरह सवालों के जवाब देने ही है। वो अपने मन में सवालों के जवाब को तलाशने लगी लेकिन उसकी तलाश ख़त्म होने से पहले उसके सामने नया सवाल आ गया

"वो सारी बातें तुमने बिना ख़त देखे सुना दिया।"

"वो सारे लफ़्ज़ मेरे ज़हन में उतर गए है।"

"फिर बताओ, इसमें बहुत सी बातें है जो समझ से परे है।" अम्मा साहब का इशारा वो समझ चुकी थी लेकिन उसका जवाब किस तरह दे ये नही समझ पाई। उन दोनो के अंदर अजीब सा दर्द था, एक कसक जिसे हल करना मुश्किल हो रहा था।

"अभी भी क्या कुछ नहीं बताओगी? अपने क़रीब क्या तुम मुझे अपना हमदर्द नहीं समझती? क्या तुम्हारी नज़र में मैं
इस दर्जे पर भी नही की तुम मुझे अपना हाल बता सको?" उसकी चुप्पी अम्मा साहब के मन में उलझन पैदा करने लगी थी, और उनकी बातें सुनकर अम्हेल ने उनका मान रखते हुए फौरन कहा 

"ऐसा ख़त्तई नहीं है, आपका दर्जा मेरी नज़र में अदब का है, हम जानते है आपका रुतबा बलंद तरीन है। हम ऐसा सोच भी नही सकते।" 

"तो क्या इस दर्जे की वजह से तुम दूर दूर रहती हो, क्या मेरा रुतबा तुम्हारे रास्ते को तंग बनाता है?" 2 पल खामोशी के बाद उन्होंने कहा "लेकिन मेरे नज़दीक तुम बेहद ख़ास हो, एक क़ीमती तोहफ़ा।" उनका बदला लहजा जज़्बात की कश्ती में सवार होकर हिचकोले खाने लगा जिससे अम्हेल हैरान हो गई

"तुम्हारे बाबाजान की तरफ़ से मिला हुआ तोहफ़ा हो तुम, एक वादा जिसका निबाह मुझे तुम्हारे ज़रिए करना है इसलिए मैं किसी भी हाल में तुम्हे मुश्किलों में नहीं पड़ने देना चाहती हूं।" 

बाबाजान के ज़िक्र पर अम्हेल की वो सारी हिस जाग उठी जो ख़त में सो रही थी। वो एकटक उनपर नज़र टिकाए उन्हें देखने लगी 

"सिर्फ़ तुम्हारे बाबाजान हैं जो तुम्हे समझा सकते हैं।" उन्होंने कहा "तुम सुनना चाहती हो?"

"जी।" उसने उत्सुकता से कहा, 

"बहुत अरसा पहले तुम्हारे बाबा अपने बाबा के साथ हमारे गांवों आए थे, तब हम दोनों कमसिन थे। उस वक़्त वो बिल्कुल आज़ाद थे मगर लालगंज से बंधे हुए थे।" उन्होंने लालगंज को याद करते हुए बताया

"दरअसल वो अक्सर लालगंज आया करते थे अपने कामों के सिलसिले में, वही पर हमारी मुलाक़ात हुई थी। उन्होंने लालगंज की ज़मीन पर अपने बाबा के लिए अपने खिलाफ़ एक फ़ैसला लिया, और हम दोनों से वादा लिया की उसकी इज़्ज़त का हमेशा ख़्याल करेंगे, ऐसा कभी कुछ नहीं करेंगे जिससे उसे ठेस पहुंचे।" उसके बाद उन्होंने अम्हेल का हाथ थामकर बताया

"जिस पल दरगाह में मुझे तुम मिली और जिस पल तुमने मुझे बताया कि तुम्हारा ताल्लुक़ बे लोस हवेली से है उस पल मुझे सारे वादे याद आ गए।" 

अम्हेल दरगाह के वक़्त को याद करने लगी। जो बात उसे उस वक़्त समझ नही आई थी वो अब साफ़ हो चुकी थी।

"तुम्हे महल में देखकर मुझे सुकून मिलता है, मुझे महसूस होता है वो अपने वादे से मायूस नही है।" अम्मासाहब के चेहरे पर नर्म से दर्द की लहरें नज़र आने लगी, कसक झलकने लगी, और छलकने को तयार थी। उसे घोंट कर उन्होंने फिर कहा 

"तुम मेरे वादों की रवादार नही हो, तुम अपने फैसलों के लिए बअख़त्यार हो मगर मुझे और इम्तेहान में मत डालना। तुम्हे इस तरह परेशान होता देखकर बहुत से लोगों को अज़ीयत होती है, हर पल तुम्हारी उदासी, मायूसी सबको परेशान करती है। तुम मेरे लिए तोहफ़ा ही हो इसलिए ख़ुद को किसी से कमतर महसूस मत करो।" उनकी बातों को ग़ौर से सुनकर अम्हेल न आह भरकर कहा

"हम समझ गए।" 

"मैं वाक़िफ हूं कि तुम अभी ये सुनने के लिए तैयार नहीं थी लेकिन शायद यही सही वक़्त था....।" अम्मा साहब की आवाज़ अम्हेल के कानो तक गई मगर दूसरे पल उसने ख़ुद को अलग दुनिया में पहुंचा लिया

"....... बाबाजान... बाबाजान...क्या पढ़ रहे है आप?
.....अफसाना पढ़ रहा हूं.....
......आपने कितनी किताबें फैला के रखा है, हम इन्हें अपनी जगह पर रख देते है।......... हम तो थक गए इन्हें रखते रखते अब बस हम नही रख पाएंगे.......
..........बेटे जिस काम के लिए आप ज़िम्मेदार बन रही है उसे ज़िम्मेदारी से पूरा करने का हौसला भी रखिए, फिर चाहे वो कोई भी काम हो, रिश्ता हो या फिर मुहब्बत, अगर निबाह करने का हौसला नहीं रखतीं तो उसके लिए अपने क़दम आगे मत बढ़ाइए........।"

"अब शायद मुझे बाबाजान की कही बातों का मतलब पूरी तरह समझ आ गया।" उसने बीती दुनिया से बाहर आकर कहा 

"मुझे लालगंज के बारे में मालूम है। हमसे बाबाजान अक्सर लालगंज की बातें किया करते थे। लेकिन उसके बाद वो कहते थे दफ़न किस्सो को दफ़न रहने देना चाहिए इसलिए हमें लालगंज जाने की इजाज़त नहीं थी, हमें उस वक़्त ज़्यादा कुछ समझ नहीं आता था मगर आज हम समझ गए बाबाजान की हर बात का मतलब।"

"क्या वाक़ई वजाहत लालगंज की बातें करते थे?" अम्मासाहब ने ताज्जुब अंगेज़ होकर पूछा मगर तबतक अम्हेल वापस वहीं लौट चुकी थी

"......... बाबाजान क्या हम अभी ज़िम्मेदार नहीं है? आप ऐसा क्यों कह रहे है, हम आपको ज़िम्मेदार नही लगते क्या?.........
......... हा हा हा, आप ज़िम्मेदार है, मगर हम नही चाहते की आपमें से कोई भी अपनी ली हुई ज़िम्मेदारी से पीछे हटे हमारी तरह। हम चाहते है आपलोग ख़ुद पर जिस भी ज़िम्मेदारी का भार लें उन्हें मुकम्मल करें बीच से छोड़ ना दें........
...........ऐसा क्यों कह रहे है आप, आप तो अपनी सारी ज़िम्मेदारी बख़ूबी निभाते है, आपने तो कभी भी किसी भी ज़िम्मेदारी को बीच से नहीं छोड़ा, न कस्बे के लोगों की, ना शाहबाद की और न हमलोगों की फिर क्यों कह रहे है ऐसा?...........
............ ताकि आप और आपके भाई बहन समझ सके की आपलोगों को अपनी जिंदगी में क्या करना है। ताकि मेरे ऊपर से एक भारी बोझ हल्का हो सके।................"

"बाबाजान आप कई तकलीफों से गुज़र गए मगर आपने अपनी सारी ज़िम्मेदारीयां बख़ूबी निभाया।" 
नम आंखो से अपने हथेली के चांद को देखकर उसने अपने बाबाजान को मुस्कुराते हुए याद किया

"उसने वाक़ई सब याद रखा।" अंदर ही अंदर बहते हुए एहसासात के रुख़ को मोड़कर उन्होंने अम्हेल से पूछा 

"क्या तुम इस ख़त का जवाब नही दोगी? मुझे एहसास है तुम इसकी वजह से खींचा खींचा महसूस कर रही हो। तुम अपने भाई के लिए ख़त लिखकर हवेली के लिए रवाना करवा सकती हो।" इस सिलसीले में अम्हेल की तरफ़ से पहल न पाकर उन्होंने ख़ुद पहल कर दिया

"आपने कैसे समझा?"

"मेरी नज़रों ने कई अरसों से बहुत से मरहले देखें है, तुम्हारे चेहरे से तुम्हारी उलझनें ज़ाहिर हैं ,और ख़त में लिखे लफ़्ज़ों से साफ़ है कि उसे अभी का हाल मालूम नही है।"

"अम्मा साहब दाइजां पैग़ाम लाईं हैं।" दरवाज़े पर पहरा देती मैथिली की आवाज़ अंदर आई "मुंशीजी और शेख़ बाबा मिलना चाहते हैं।" 

"उनसे कहो वो आ सकते है।" जवाब देकर वो अम्हेल से दुबारा मुकातिब हो गईं "मेरी किसी भी बातों से रूपोष मत होना, उन्हें याद रखना.....हमेशा। अब तुम जाओ आराम करो।" 

"हम आपको यक़ीन दिलाते हैं, हम वैसा ही करेंगे जैसा बाबाजान चाहते हैं, और अपनी हिफाज़त करेंगे पूरी तरह।"
अम्हेल ने खड़े होकर कहा और जाने लगी। 

जाने से पहले अम्मा साहब का एक आख़िरी सवाल आया
"मुझे बताओ क्या तुमने लालगंज के फसानोह को खंडहरोह के बीच तलाश करने के लिए कभी भी ख़ुद को आमादा नही किया?"

"मेरे बाबाजान ने एक दफ़ा हमसे कहा था अगर कभी तुम्हें अपनी तालाश के दरमियान कोई ऐसा मिले, जो मुझसे वाक़िफ हो, जिसका ताल्लुक़ लालगंज से हो समझ जाना तुम्हारी तालाश ख़त्म हो गई।" कहकर वो चली गई

अम्हेल का जवाब सुनकर अम्मा साहब पुरानी बातों को याद करके रुआसा हुई मगर उनके दिल को एक ख़ुशी भी महसूस हुई। 

अम्हेल भी इक़ामतगाह आ गई और बाबाजान की बातों की पुरानी किताबें खोलकर लेट गई, छत के खुले दरवाज़े से ठंडी हवाओं के आने का एहसास भी उसे ना हुआ, बल्कि उसने आसमान की दुनिया में चांद सितारों के साथ, ख़ुद को, दूर से उनकी महफ़िल में शामिल कर लिया। उनकी महफ़िल में सजे परदे कभी उठते कभी गिरते जिसके पीछे चांद छुप जाता और खिड़की के परदे को हल्का सा हटाकर बिल्कुल नई दुल्हन की तरह शर्माता। अम्हेल ने काफ़ी देर तक सब देखा फिर मुस्कुराने लगी।