Begusarai The Dark Syndicate in Hindi Thriller by RAAHULL SHARMA books and stories PDF | बेगूसराय द डार्क सिंडिकेट - 6

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बेगूसराय द डार्क सिंडिकेट - 6

कमिश्नर राकेश संध्या के बिल्कुल करीब आए और धीमी लेकिन बेहद सख्त आवाज में बोले, "संध्या, तुमने सिर्फ अपनी साख नहीं दांव पर लगाई, बल्कि उस वर्दी का भी अपमान किया है जिसे पहनने का सपना हज़ारों ईमानदार लोग देखते हैं। अब इसका हर्जाना तो तुम्हें भरना ही होगा।"
सस्पेंशन और सरेंडर
कमिश्नर ने सबकी मौजूदगी में अपना हाथ संध्या के कंधे की ओर बढ़ाया और उसके कंधे पर लगे सितारे (Stars) नोच लिए। भीड़ में सन्नाटा छा गया, सिर्फ कैमरों के फ्लैश की आवाज गूंज रही थी।
कमिश्नर: "आईपीएस संध्या सिंह, आपको तत्काल प्रभाव से सस्पेंड किया जाता है। अपनी सर्विस रिवॉल्वर और आईडी कार्ड अभी इसी वक्त मेरे हवाले करो।"
संध्या की आँखें नम थीं, लेकिन उनमें हार के आंसू नहीं बल्कि धधकती हुई ज्वाला थी। उसने कांपते हाथों से अपनी बेल्ट से रिवॉल्वर निकाली और कमिश्नर की ओर बढ़ा दी। अभिमन्यु को भी हिरासत में ले लिया गया।
कमिश्नर राकेश का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्होंने संध्या और अभिमन्यु के आई-कार्ड छीनकर जेब में रखे और गेट की तरफ इशारा करते हुए दहाड़कर बोले:
"निकल जाओ यहाँ से! इससे पहले कि मैं तुम दोनों को हथकड़ियाँ लगवाकर जेल भेज दूँ, मेरी आँखों के सामने से दफा हो जाओ! बेगूसराय पुलिस को तुम्हारी शक्ल दोबारा हेडक्वार्टर में न दिखे।"
अपमान की गलियाँ
संध्या और अभिमन्यु जब खन्ना मैंशन के उस आलीशान गेट से बाहर निकले, तो मीडिया के कैमरों ने उन्हें घेर लिया। 'असफल ऑफिसर', 'गुंडी पुलिस' जैसे शब्द हवा में तैर रहे थे। पुलिस की जो गाड़ियाँ उन्हें लेकर आई थीं, वे भी कमिश्नर के आदेश पर उन्हें छोड़कर वापस लौट गईं।
अभिमन्यु ने सिर झुका लिया था, "मैडम, सब खत्म हो गया। आज हमने अपनी वर्दी भी खो दी और इज्जत भी।"
संध्या रुकी नहीं। वह तेज कदमों से भीड़ को चीरती हुई आगे बढ़ी। उसके चेहरे पर अपमान की लकीरें तो थीं, पर उसकी चाल में अभी भी वही दृढ़ता थी। वह जानती थी कि अगर वह आज टूट गई, तो 'ज़ोरान' की जीत पक्की हो जाएगी
उधर संध्या के घर वाले जो एक बहन नंदिनी एक छोटा समर्थ भाई हंसी-खुशी अपने माता-पिता से बात कर रहे थे पर जैसे ही संध्या घर पर आती है और वह उनको बताती है तो उनके पैरों तले से जमीन खिसक जाती है
संध्या के घर का माहौल कुछ देर पहले तक उत्सव जैसा था। माँ ने संध्या की पसंदीदा खीर बनाई थी और छोटा भाई समर्थ अपनी नई ड्राइंग दिखा रहा था, जबकि बहन नंदिनी अपनी कॉलेज की ट्रिप के बारे में चहक-चहक कर बता रही थी। पिता जी अखबार पढ़ते हुए बीच-बीच में मुस्कुरा रहे थे।
जैसे ही दरवाजे की कुंडी खटकी, समर्थ दौड़कर गया, "दीदी आ गईं!"
लेकिन जैसे ही संध्या अंदर दाखिल हुई, घर का तापमान जैसे एकदम गिर गया। संध्या के बाल बिखरे हुए थे, उसकी वर्दी की कमीज पर से सितारे गायब थे, और आँखों में वह चमक नहीं थी जो हमेशा हुआ करती थी। पीछे खड़ा अभिमन्यु भी अपराधी की तरह सिर झुकाए खड़ा था।
सन्नाटे की चीख
नंदिनी की हंसी उसके होठों पर ही जम गई। पिता जी ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और खड़े हो गए।
पिता जी: (धीमी आवाज में) "संध्या... यह क्या हाल बना रखा है? और ये... तुम्हारी वर्दी के सितारे कहाँ हैं?"
संध्या की आवाज जैसे उसके गले में फंस गई थी। उसने एक गहरी सांस ली और कांपती आवाज में कहा, "पापा, मुझे सस्पेंड कर दिया गया है। मुझ पर एक रसूखदार इंसान के घर में डकैती और बदतमीजी का इल्जाम लगा है।"
यह सुनते ही माँ के हाथ से स्टील की थाली छूटकर फर्श पर गिरी। उसकी खनक पूरे कमरे में गूंज उठी, पर किसी ने उसे उठाने की कोशिश नहीं की। माँ ने अपने मुंह पर हाथ रख लिया और सोफे के सहारे बैठ गईं।
अभी घर के भीतर यह भावनात्मक तूफान थमा भी नहीं था कि अचानक कमरे के कोने में लगा टीवी बज उठा। समर्थ ने रिमोट उठाया, लेकिन वॉल्यूम बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ी—हर चैनल पर संध्या की तस्वीर और 'ब्रेकिंग न्यूज़' की पट्टियाँ दौड़ रही थीं।
न्यूज़ हेडलाइंस: "वर्दी के पीछे का गुंडा चेहरा"
न्यूज़ एंकर की चीखती हुई आवाज़ पूरे कमरे में गूंजने लगी:
"बेगूसराय की 'लेडी सिंघम' का असली चेहरा बेनकाब! सस्पेंडेड आईपीएस संध्या सिंह ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघी। डॉ. अद्वैत खन्ना जैसे समाजसेवी के घर में आधी रात को बिना वारंट के घुसपैठ। देखिए कैसे कमिश्नर राकेश ने सरेआम छीने संध्या के सितारे!"
स्क्रीन पर वह वीडियो चल रहा था जिसमें कमिश्नर संध्या के कंधे से सितारे नोच रहे थे। फिर डॉ. अद्वैत खन्ना का एक 'बाइट' (बयान) आया:
"मुझे दुख है कि प्रशासन में ऐसे लोग हैं जो अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हैं। मेरी चैरिटी फाउंडेशन के बच्चों के सामान को भी इन्होंने तहस-नहस कर दिया। मैं कानून से न्याय की मांग करता हूँ।"
घर का माहौल: सन्नाटा और सिसकियाँ
न्यूज़ देखकर माँ की सिसकियाँ बंध गईं। पिता जी का सिर शर्म से झुक गया, मानो उन्होंने अचानक अपनी उम्र से दस साल ज़्यादा का बोझ महसूस किया हो।
नंदिनी: (टीवी की तरफ इशारा करते हुए) "दीदी, देखिए! पूरे शहर में आपकी थू-थू हो रही है। लोग नीचे कमेंट्स में आपको क्या-क्या कह रहे हैं... 'बदमाश', 'पागल', 'करप्ट'।"
पिता जी: (भारी आवाज़ में) "संध्या, एक मिडिल क्लास आदमी के लिए उसकी इज़्ज़त ही उसकी सबसे बड़ी दौलत होती है। आज तुमने हमारी उस दौलत को सरेबाज़ार नीलाम कर दिया। कल मैं बाहर निकलूंगा तो लोग मुझसे क्या कहेंगे?"
संध्या ने देखा कि उसके छोटे भाई समर्थ ने अपनी स्कूल की वह बेज (badge) उतारकर मेज पर रख दी जिस पर लिखा था 'My Sister My Hero'। यह देखकर संध्या का कलेजा छलनी हो गया।
अपमान से उपजा प्रतिशोध
तभी घर के बाहर शोर सुनाई दिया। मोहल्ले के कुछ लोग और मीडिया के कुछ स्थानीय रिपोर्टर गेट के बाहर जमा होने लगे थे। वे संध्या के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे।
अभिमन्यु: "मैडम, हमें यहाँ से निकलना होगा। भीड़ बढ़ रही है, और अगर हमने अभी कुछ नहीं किया तो स्थिति हाथ से निकल जाएगी।"
संध्या ने टीवी बंद कर दिया। उसने अपनी आँखों के आंसू पोंछे और अपने पिता के पास जाकर उनके हाथ थाम लिए।
घर के बाहर का नजारा किसी दंगे से कम नहीं था। मोहल्ले के वे लोग, जो कल तक संध्या को 'बेगूसराय की बेटी' कहते नहीं थकते थे, आज कैमरे के सामने सबसे ऊँची आवाज़ में चिल्ला रहे थे। पत्रकारों के माइक और कैमरों की लाइटों ने संध्या के घर के दरवाजे को एक कटघरे में बदल दिया था।
बाहर से आती गूंजती आवाजें घर की दीवारों को हिला रही थीं:
भीड़ और पत्रकारों के तीखे नारे: