Amrut Vaani in Hindi Motivational Stories by Nitya Oswal books and stories PDF | अमृत वाणी - संत वाणी - 16

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अमृत वाणी - संत वाणी - 16

हम सब जीवन में ज्ञान पाना चाहते हैं, ईश्वर को खोजना चाहते हैं, और मन की शांति चाहते हैं। इसके लिए हम मोटी-मोटी किताबें पढ़ते हैं, बड़े-बड़े प्रवचन सुनते हैं और खुद को बहुत ज्ञानी समझने लगते हैं। लेकिन इतना सब करने के बाद भी हमारा गुस्सा, हमारा लालच और हमारी बेचैनी वैसी की वैसी ही बनी रहती है। इस खोखले ज्ञान और आंतरिक सच्चाई के अंतर को संत रामकृष्ण परमहंस जी ने एक बहुत ही सुंदर उदाहरण से समझाया है:

“किताबों के भीतर ‘पंचांग’ (कैलेण्डर) तो होता है, और उसमें लिखा भी होता है कि इस साल इतनी भारी बारिश होगी। लेकिन अगर तुम उस पंचांग को पकड़कर ज़ोर से निचोड़ोगे, तो उसमें से पानी की एक बूंद भी बाहर नहीं गिरेगी।”
— संत रामकृष्ण परमहंस

इस बात को सुनकर लोग अक्सर एक अजीब विरोधाभास में उलझ जाते हैं। वे सोचते हैं कि क्या परमहंस जी हमें पढ़ाई-लिखाई करने से मना कर रहे हैं? क्या किताबें पढ़ना, ज्ञान इकट्ठा करना या धार्मिक ग्रंथों को समझना बेकार है? क्या हमें सब कुछ छोड़कर अनपढ़ बन जाना चाहिए?

लेकिन यहाँ ज्ञान का विरोध नहीं है। ठाकुर रामकृष्ण जी हमें पढ़ाई छोड़ने के लिए नहीं कह रहे, बल्कि वे हमें उस ‘अहंकार’ से बचा रहे हैं जो सिर्फ किताबी बातें रट लेने से इंसान के भीतर आ जाता है। वे समझा रहे हैं कि सिर्फ शब्दों को याद कर लेना ज्ञान नहीं है; जब तक वह ज्ञान आपके व्यवहार में, आपके कर्मों में नहीं उतरता, तब तक वह पंचांग में लिखी उस सूखी बारिश की तरह है जिससे किसी की प्यास नहीं बुझ सकती।

इसे आप एक वैज्ञानिक और दैनिक जीवन के उदाहरण से बहुत आसानी से समझ सकते हैं। फर्ज़ कीजिए कि कोई व्यक्ति तैरने (Swimming) पर लिखी दुनिया की सबसे बेहतरीन पाँच किताबें पूरी तरह रट लेता है। उसे पानी के घनत्व, सांस लेने की तकनीक और हाथों के मूवमेंट की पूरी किताबी जानकारी है। लेकिन उसने आज तक कभी पानी में पैर भी नहीं रखा है। अब यदि उसे अचानक एक गहरी नदी में फेंक दिया जाए, तो क्या उसकी वह किताबी विद्या उसे डूबने से बचा पाएगी? बिल्कुल नहीं, वह डूब जाएगा। तैरने के लिए किताबों की नहीं, पानी में उतरकर 'अनुभव' (Experience) करने की जरूरत होती है।

आज के इस डिजिटल और इंटरनेट के दौर में भी यही हो रहा है। हमारे पास ज्ञान की कोई कमी नहीं है; गूगल और सोशल मीडिया पर हर रोज़ लाखों मोटिवेशनल और आध्यात्मिक विचार हमारे सामने से गुज़रते हैं। लेकिन हम सिर्फ उन्हें ‘शेयर’ करते हैं, अपने जीवन में ‘लागू’ (Apply) नहीं करते। मनोविज्ञान के अनुसार, जब इंसान सिर्फ ज्ञान की बातें पढ़ता रहता है और उन्हें अमल में नहीं लाता, तो उसका दिमाग एक झूठे संतोष में जीने लगता है कि “मैं सब कुछ जानता हूँ”, जबकि उसका आंतरिक स्वभाव वैसा ही क्रोधी और अशांत बना रहता है।

मन की शंका का सीधा समाधान
अब यहाँ एक तार्किक सवाल उठता है: “यदि किताबी ज्ञान से कुछ नहीं होता, तो फिर संतों ने इतने ग्रंथ क्यों लिखे? हमें सही और गलत की पहचान कैसे होगी यदि हम पढ़ना-लिखना या सीखना छोड़ देंगे?”

विरोधाभास तब दूर होता है जब आप ‘सूचना’ (Information) और ‘अनुभव’ (Realization) का अंतर समझ लेते हैं। किताबें बहुत अच्छी चीज़ हैं, वे एक नक्शे (Map) की तरह हैं। नक्शा आपको रास्ता दिखाता है कि मंज़िल कहाँ है, लेकिन सिर्फ नक्शे को देखते रहने से आप मंज़िल पर नहीं पहुँच जाते; पैर तो आपको खुद ही बढ़ाने होंगे। यदि किसी किताब में लिखा है कि “क्रोध करना पाप है”, तो उस लाइन को सिर्फ याद मत रखिए। अगली बार जब आपको किसी पर गुस्सा आए, तो 2 मिनट शांत रहकर उस ज्ञान को अपने व्यवहार में उतारिए। जब ज्ञान आपके आचरण का हिस्सा बन जाता है, तभी वह फल देता है।

आज के जीवन के लिए व्यावहारिक सूत्र
★ कम पढ़ें, ज़्यादा जिएं: दिन भर में भले ही आप एक ही अच्छी बात पढ़ें या सुनें, लेकिन कोशिश करें कि पूरे दिन में कम से कम एक बार उस बात को अपने कर्म में लेकर आएं।

★ अहंकार से बचें: यदि आप कोई अच्छी किताब पढ़ रहे हैं या अच्छी आदतें सीख रहे हैं, तो दूसरों को अज्ञानी या छोटा समझना बंद करें। सच्चा ज्ञान इंसान को झुकाता है, अकड़ाता नहीं।

★ अनुभव को महत्व दें: शब्दों के जाल में फँसने के बजाय अपनी आत्मा की आवाज़ को सुनें। शांत होकर खुद का निरीक्षण करें कि आप हर दिन एक बेहतर इंसान बन रहे हैं या नहीं।

आज का आत्म-संकल्प
“मैं आज यह दृढ़ संकल्प लेता हूँ कि मैं सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करने वाला ज्ञानी नहीं बनूँगा। मैं जो कुछ भी अच्छा सीखूँगा, उसे अपने व्यवहार, अपने कर्म और अपनी बोलचाल में पूरी ईमानदारी से उतारूँगा। आज से मेरी असली मज़बूती मेरा किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि मेरी पवित्र और शांत जीवन-शैली होगी।” 🙏