Karmjali Kokh - 3 in Hindi Women Focused by kalpita books and stories PDF | कर्मजली कोख... - 3

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कर्मजली कोख... - 3

पिता न बन पाने का दर्द
उसके भीतर के पति पर भारी पड़ चुका था।
आसिफ ने धीमी मगर ठंडी आवाज़ में पुलिस से कहा —
“आप लोग जाइए…
यह हमारा घर का मामला है।”
इतने में दरवाज़े पर हलचल हुई।
सबकी नज़र एक साथ उधर मुड़ गई।
दरवाज़े पर रेशमा खड़ी थी।
कमज़ोर… पीली…
मानो शरीर में अब जान का एक कतरा भी बाकी ना हो।
अस्पताल के कपड़ों के ऊपर एक फीकी सी चादर डली थी।
उसकी बाँहों में सफेद कपड़े में लिपटा
उसका मृत बच्चा था…
जिसे वह अब भी ऐसे पकड़े हुई थी
जैसे कोई उससे फिर छीन न ले।
उसके लड़खड़ाते शरीर को
उसकी सौतेली छोटी बहन साजिया संभाले हुए थी।
पीछे उसके अब्बू खड़े थे
और उनके साथ उसकी सौतेली माँ।
पूरा आँगन कुछ पल के लिए पत्थर बन गया।
आसिफ की आँखें फैल गईं।
शायद उसने सोचा भी नहीं था
कि रेशमा इस हालत में खुद यहाँ आ जाएगी।
रेशमा ने एक बार पूरे घर को देखा।
वही घर
जहाँ वह सात साल तक बहू बनकर रही…
जहाँ हर दीवार पर उसने अपने सपने टाँगे थे।
फिर उसकी नज़र आसिफ पर जाकर ठहर गई।
ना शिकायत थी,
ना चीख,
ना बद्दुआ।
बस एक टूटी हुई औरत की खामोश नज़र…
जो पूछ रही थी —
“क्या सच में मेरा कसूर सिर्फ इतना था
कि मैं तुम्हें जिंदा औलाद नहीं दे पाई?”

लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ती रेशमा
आसिफ के सामने आकर रुक गई।
उसने काँपते हाथों से
अपने बच्चे को उसकी तरफ बढ़ा दिया।
“आसिफ…”
उसकी आवाज़ बुझते हुए दीये जैसी काँप रही थी,
“अपने इस बेटे को भी जन्नत का रास्ता दिखा दो…”
आँगन में खड़े हर इंसान की साँस जैसे थम गई।
“इस मासूम को यह  दुनिया पसंद नहीं आई…”
रेशमा की आँखें अपने बच्चे के चेहरे पर जमी थीं,
“मैं इस फ़रिश्ते की माँ बनने लायक नहीं थी…
इसलिए वापस खुदा के पास चला गया…”
उसने अपने सीने पर हाथ रख लिया।
“मुझसे इतना क्यों नाराज़ है ऊपरवाला…
कि मेरी छाती में उतरे दूध का
एक कतरा भी पीना मंज़ूर नहीं किया इसने…”
रेशमा अपनी धुन में बोलती जा रही थी ।

आसिफ के हाथ काँप उठे
जब उसने बच्चे को अपनी बाँहों में लिया।
सफेद कपड़े में लिपटा
वह छोटा सा जिस्म
मानो रूई का टुकड़ा हो।
नीले पड़ चुके होंठ…
बंद पलकें…
और चेहरे पर लगा हुआ रेशमा की छाती से निकला दूध।
वही दूध
जो किसी माँ की सबसे बड़ी नेमत होता है…
जो बच्चे के शरीर में उतरकर उसे जीवन देता है।
पर उस दूध को क्या पता था
कि बच्चे को बदनसीब कहा जाए —
जो दुनिया में आते ही चला गया,
या उस माँ को कर्मजली 
जिसकी कोख हर बार हरी होकर भी खाली रह जाती थी।

आसिफ ने मृत बच्चे को अपनी छाती से लगा लिया।
पहली बार उसकी आँखों से आँसू टूटकर गिरे।
शायद उस पल
उसे अपने बेटे का वज़न नहीं,
अपनी हार महसूस हो रही थी।

थोड़ी देर बाद मौलवी साहब आए।
उन्होंने सफेद कपड़े में लिपटे उस नन्हे जिस्म को
बहुत एहतियात से अपनी बाँहों में लिया।
शाम ढल रही थी।
कब्रिस्तान के एक कोने में,
जहाँ पहले से तीन छोटी-छोटी कब्रें बनी थीं,
उनके पास ही एक फुट ज़मीन और खोदी गई।
कुछ मिट्टी हटाई गई…
और रेशमा का चौथा बेटा
अपने तीन भाइयों के पास सुला दिया गया।
चार छोटे टीले
अब आसमान के नीचे साथ-साथ थे।

घर लौटने के बाद
बैठक में एक कड़ा फैसला लिया गया —
रेशमा वापस लखनऊ जाएगी,
अपने मायके।
लेकिन उसके अब्बू और सौतेली माँ
इस फैसले के हक में नहीं थे।
एक तरफ दुनियादारी का डर था —
लोगों के सवाल, ताने, बदनामी।
दूसरी तरफ उनकी माली हालत,
जो खुद मुश्किल से दो वक्त की रोटी संभाल पा रही थी।
रेशमा को वापस लाना
सिर्फ एक बेटी को घर लाना नहीं था,
बल्कि उसके साथ उसकी टूटी हुई ज़िंदगी का बोझ भी उठाना था।
बहुत देर तक बहस चलती रही।
आखिर मौलवी साहब ने धीमी आवाज़ में कहा —
“निकाह कोई खेल नहीं होता।
एक मौका और देना चाहिए।
शायद अल्लाह अगली बार रहमत कर दे।”
कमरे में बैठे लोगों ने धीरे-धीरे हामी भर दी।
लेकिन शायद किस्मत
अब रेशमा से बुरी तरह नाराज़ हो चुकी थी।
तभी अब तक चुप खड़ी साजिया आगे बढ़ी।
उसने काँपते हाथों से
डॉक्टर की रिपोर्ट आसिफ की तरफ बढ़ा दी।
कागज़ पर साफ लिखा था —
“रेशमा अब कभी माँ नहीं बन सकती।”
कमरे में जैसे अचानक सब कुछ जम गया।
आसिफ की आँखें उस एक लाइन पर टिक गईं।
सास के चेहरे से आखिरी उम्मीद उतर गई।
और रेशमा…
वह चुपचाप ज़मीन को देखती रही।
जैसे उसकी किस्मत का फैसला
पहले ही लिखा जा चुका था।
... to be continued