mitti ki mehak in Hindi Short Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | मिट्टी की महक

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मिट्टी की महक

मिट्टी की महक  रवि के बच्चे शहरी जिंदगी से बोर हो चुके थे। सुबह से जिद कर रहे थे - कहीं फार्महाउस पर घुमाने ले चलो। वहाँ बहुत सारी गतिविधियां होती हैं। रवि चुपचाप अपने कम्प्यूटर में मेल लिखने में व्यस्त था। बच्चों की जिद के आगे वो अपना काम बंद कर देता है। बच्चों को अपने पास बिठाकर उन्हें बताता है कि -" बच्चों तुम्हें फार्म हाउस जाना पसंद है। मेरा तो घर हुआ करता था वहाँ। चार पैसे कमाने आया शहर, गाँव मेरा याद आता रहा। क्यों ना हम सब छुट्टियां मनाने इस बार गाँव चलें। वहाँ तुम्हें असली फार्महाउस दिखाता हूँ। जाओ मम्मी से बोलो सामान पैक करने के लिए।  बच्चों के रूम से जाने के बाद रवि अपनी बालकनी में रखी कुर्सी पर बैठ खुला आसमान देखने लगता है। कितना सुकून देता है यह खुला नीला आकाश। सबके पास होता है अपना - अपना खुला आसमान। रवि अपने गाँव की यादों में खो जाता है। सुबह की पहली किरण जब धरती को छूती है, तो गाँव के खेत जाग जाते हैं।  ओस की बूँदें गेहूँ की बालियों पर मोती बनकर टँगी होती हैं। हवा चलती है तो लगता है जैसे हज़ारों दीयों में एक साथ बाती जल उठी हो।  दूर तक फैली हरियाली ऐसी लगती है मानो धरती ने हरी चुनरी ओढ़ ली हो।  गेहूँ के खेत हवा के साथ लहराते हैं - कभी दाएँ, कभी बाएँ। लगता है जैसे कोई अदृश्य राधा घाघरा पहनकर नाच रही हो। बीच-बीच में सरसों के पीले फूल ऐसे चमकते हैं जैसे हरी चादर पर किसी ने सोने की कढ़ाई कर दी हो।  मेड़ पर खड़ा बूढ़ा बरगद सौ सालों से खेतों का पहरेदार है। उसकी जटाएँ ज़मीन तक लटक रही हैं, जैसे दादा अपने पोतों को आशीर्वाद देने झुके हों। उसी की छाँव में किसान अपना खाना खाता है - गुड़ के साथ मोटी रोटी, प्याज़ और हरी मिर्च। वही उसका फाइव-स्टार होटल है।  खेत की पगडंडी पर जब बैलगाड़ी चलती है, तो चूल्हे से उठते धुएँ की तरह धूल उड़ती है। पगडंडी के दोनों तरफ खड़े गन्ने के खेत पहरेदार सिपाही से लगते हैं। बच्चा तोड़कर गन्ना चूसता है तो रस की धार उसकी कुहनी तक बह आती है - वो मिठास शहर की कोल्ड ड्रिंक में कहाँ।  शाम ढले जब सूरज डूबता है, तो पूरा खेत सोने का हो जाता है। चिड़ियों की चहचहाहट, कुएँ की रहट की आवाज़, और दूर मंदिर से आती घंटी - मिलकर गाँव का भजन बन जाते हैं। किसान खुरपी कंधे पर रखे घर लौटता है, उसके पैरों में लगी मिट्टी कहती है - _'तू मेरा है, मैं तेरी हूँ'_।  रात को चाँदनी जब खेतों पर उतरती है, तो हरियाली चाँदी की हो जाती है। जुगनू तारे बनकर उड़ते हैं। लगता है धरती और आसमान ने जगह बदल ली हो।  इसकी यादों का गांव कुछ ऐसा ही था। उसे अपने घर की याद सताने लगती है।एक छोटा सा गाँव, और उसमें बड़ा सा उसका घर। रवि के पिता एक किसान थे। बहुत सी खेतीबाड़ी की जमीन थी। अपने पिता के साथ रवि भी जाता खेतों पर उसे बहुत अच्छा लगता खेत पर जाना, इंजन का पानी, खेत में चारपाई, उस पर बैठा रवि निहारता रहता प्रकृति को।  रवि के बच्चे सहसा आकर रवि को स्वप्न से जगाते हैं। अगले दिन सभी गाँव पहुँच जाते हैं। दरवाजे पर बैठी माँ बच्चों का इंतजार करते हुए मिलती है। रवि झुककर माँ के चरण स्पर्श करता है। अपनी बीबी सरिता से बच्चों के लिए कुछ बनाने के लिए कहता है और खुद वहीं आँगने में अपनी माँ के पास बैठ जाता है। रवि की माँ रवि का सिर सहलाने लगती है। रवि अपने मन की व्यथा माँ से कहता है -" माँ आपको याद है जब मैं पहली बार शहर गया था नौकरी करने, पिताजी ने बहुत समझाया था कि दूसरों की नौकरी करने से अच्छा है अपनी खेती बाड़ी देख। गाँव में पैसा कम है लेकिन सुकून है धरती से जुड़े रहने का। पहली बारिश के बाद जब माटी से सौंधी-सौंधी महक आती है सारी चिंता दूर हो जाती है। मन प्रफुल्लित हो जाता है। माँ मैं सोच रहा हूँ बहुत कर ली नौकरी, बहुत कमा लिया पैसा। अब यहीं तेरे पास आ जाऊं। शहर में सब सुविधाएं हैं, पैसा है पर नहीं है तो सुकून। बस सारे दिन लैपटॉप में लगे रहो, ऑफिस में बॉस की चिकचिक और सारे दिन ग्राहकों के फोन। कभी-कभी तो खुला आसमान, चाँद तारे देखे हुए भी कई दिन हो जाते हैं। माँ शहर में सब अपने फ्लैट में बंद रहते हैं, कोई किसी से बात नहीं करता।  रवि की माँ ने खुश होते हुए कहा कि -" ठीक है बेटा। तेरे पिताजी के जाने के बाद मैं भी अकेली हो गई हूँ। मुझसे भी अब घर की देखभाल नहीं होती। अंधा क्या चाहे बस दो आँखे। पर तू यहाँ आकर करेगा क्या ? कुछ सोचा है ?  रवि ने खुशी से चहकते हुए बताया -" हाँ माँ ! मैंने सोच लिया है मैं यहाँ फार्म हाउस बनाऊंगा। पिताजी की इतनी जमीन बेकार पड़ी है। उस पर खेती करूंगा और गाँव के अन्य युवकों को भी रोजगार दूंगा। मैं बनाऊंगा एक सुन्दर सा फार्म हाउस। माँ तुझे पता है शहर के अमीर-अमीर लोग बहुत सारा पैसा खर्च करके कहाँ जाते हैं घूमने। वो जाते हैं ढेर सारा पैसा खर्च करके नकली गाँव घूमने। जहाँ गाँव की सभी पुरानी यादों को आधुनिकता के साथ सजाया जाता है। पता है चूल्हे की रोटी, हंडिया का साग फाइव स्टार होटल में बहुत मंहगा मिलता है। माँ मैं भी एक ऐसा फार्म हाउस बनाऊंगा। जहाँ बच्चे - बूढ़े, महिलाएं सभी आनंद ले सकें। फिर से अपना बचपन जी सकें। आधुनिकता के साथ परंपरा का मिश्रण और उसमें गाँव की मिट्टी की महक। वाह ! स्वाद ही आ गया सोचकर।  वो जो पूरब वाले खेत हैं ना वहाँ बनाऊंगा अपना फार्म हाउस, अपना गाँव वहीं बसाऊंगा। तीन-चार झोपड़िया होंगी छप्पर वाली, बच्चों के लिए झूले होंगे, बूढ़ों की चौपाल सजेगी। महिलाओं के लिए भी वहाँ पेंटिंग, सिलाई, कढ़ाई आदि के स्टाल होंगे जहाँ गाँव की महिलाएं अपना खुद का  बनाया समान बेच सकेंगी। सुंदर सा बगीचा, बगीचे में झूले और उसपर लोकगीत सुनाती गाँव की महिलाएं। शहर की सब सुविधाएं होंगी बस होंगी देशी अंदाज में। और जो हमारे घर के पीछे वाला खेत है वहाँ उगेगी सब्जी। शुद्ध देशी सब्जी। आजकल बाजार में सब मिलावट का समान मिलता है। यहाँ तक कि फल और सब्जी में भी केमिकल आता है। हरी मूंग को काला रंग चढ़ाकर उड़द बनाकर बेचा जाता है। और तो और माँ दूध भी केमिकल से बनता है। तभी तो आजकल नई - नई बीमारियां हो रही हैं। जिसे देखो वो दवाई ही खा रहा है। कुछ गाएं रख लूंगा और घर का दूध, घी रहेगा तो सेहत भी बनेगी। अब इतना सारा काम अकेले थोड़े ही करूंगा। गाँव वालो को भी अपने साथ सिखवाऊंगा। उन्हें भी रोजगार मिलेगा। रवि की माँ तो जैसे सपना देख रही हो। यह सब सुनकर तो भविष्य के सपने बुनने लगी। सहसा अपने सपने को विराम देते हुए माँ ने रवि को एक प्यार की चपत लगाई और बोली - " सुन शेखचिल्ली सुनने में तो सब अच्छा है पर साकार होने के लिए बहुत मेहनत और लगन से कार्य करने की जरूरत है। रवि भी बच्चा बनते हुए जोश से बोला - " माँ तू चिंता मत कर। सब हो जाएगा ।महाकाल की कृपा से। कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती। जय महाकाल।  ---डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली