From Mon to Mahakal in Hindi Poems by Vandna Sharma books and stories PDF | मोन से महाकाल तक

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मोन से महाकाल तक

काव्य संग्रह: मौन से महाकाल तक*  
*डॉ वंदना शर्मा*

*समर्पण*  
मेरे मम्मी पापा जी और मेरे बेटे श्रीश को,  
जिनके सहयोग और अच्छे संस्कारों से मैं आज यहां तक पहुंची।  

*अनुक्रम*  
1. वो बचपन बहुत याद आता है 
 
2.मायके की गलियां  
3. पिता 
4. मै ऐसी क्यों हूं 
5. बालकनी 
6.हे प्रभु  
5. एक उम्र के बाद  
6. बारिश कब तुम आओगी  
7. उफ! ये गर्मी  
8. जब भी मैं अपनी खिड़की खोलूँ -
9. आओ सुनाऊँ तुम्हें एक कहानी - 
10. कैसे कह दूँ महिला आज सशक्त है 
 

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वो बचपन बहुत याद आता है 

वो मस्ती भरे दिन
वो पीपल की छाँव
वो सखियों का साथ
लाल-परी-नीली परी
पोशम्पा - भाई - पोशम्पा
बोल मेरी मछली कितना पानी
वो नन्हा-सा राजकुमार
वो परियों की कहानी
वो बचपन आज बहुत याद आया
आज तो कैसा सुनापन है
खाली चौपाल, खाली आँगन है
वो नन्हीं चिड़ियाँ भी आज नहीं आयीं
वो नानी का प्यार, वो दादी का दुलार
फिर से पाने को आँख छलक आयी
एक-दूजे के लिए आज वक्त नहीं है
पर नेटफ्रेंड की कमी नहीं है
इस तकनीकी दुनिया ने सबकुछ छीन लिया
नन्हें-मुन्नों से उनका भोला बचपन
और बड़ों से उनका सुख-चैन लिया
फेसबुक और वीडियो गेम ने
दुनिया को तो जोड़ा पर अपनी ही जड़ों से टूट गए हम। डॉ वंदना शर्मा 
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मायके की गलियां 
आज बस यूं एक ख्याल आया
मैं हूँ अपनी माँ की परछाई
वो ममता भरा साया
ससुराल हो भले ही कितना प्यारा
अवचेतन मन में महकता हमेशा बचपन प्यारा 
वो मायके की गलियां, वो शरारतें
साँझ होते ही लग जाती थीं छत पर बैठक
पापा सुनाते हमें अपने संघर्ष के किस्से
पर नटखट बचपन आया हमारे हिस्से
लड़की चाहे बूढ़िया भी हो जाए
मायके की याद ना दिल से जाए
क्योंकि वहाँ वो पापा की राजकुमारी थी
भाइयों की दुलारी थी, जिद्दी थी
बेफिक्र हँसती थी, नये ख्वाब बुनती थी
ना कोई जिम्मेदारी थी,
बस पढ़ना ही एक लाचारी थी
सभी के लिए मायका होता है सुहाना सपना
चाहे बाद में कोई प्यार न करे अपना
एक उम्र के बाद बस यादें रह जाती हैं
मायका शब्द सुनते ही, अधरों पर
मुस्कान आती है
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi 
==========..
पिता 
धरती सी सहनशील माँ है
पिता आकाश से भी ऊँचे
मन तो पिता का भी करता है
खेलूँ अपने बच्चे के साथ
करूँ कुछ मस्ती ,कुछ पागलपन
सिखाऊं कुछ नया साथ रहकर
मारकर अपने मन को वो भविष्यसृष्टा पिता
जाता है अपने काम पर
खटता है रात -दिन ,सुनता है बॉस की
बीमारी में भी करता काम
कभी बयां न किया अपना दर्द
किसी के आगे ,रहता मजबूत
अपने परिवार के आगे. खटता है रात -दिन ,सुनता है बॉस की
बीमारी में भी करता काम
कभी बयां न किया अपना दर्द
किसी के आगे ,रहता मजबूत
अपने परिवार के आगे
थका -हारा घर जब वो लोटे
देख संतान को सोता चैन से
भूल जाता सारे गम ,सारी चिंता
करने पूर्ण बच्चों के सपने ,इच्छाएं
करता है तमाम कोशिशें
दुनिया ने पत्थर दिल कह तो दिया पिता को
पर सूखे आंसू ,दबे जज्बात ना देखे
पूरी ज़िंदगी संघर्ष में हवन कर दी जिसने
उस पिता को शत -शत प्रणाम डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new Delhi 

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मैं ऐसी क्यूँ हूँ
मैं ऐसी क्यूँ हूँ
नहीं पसंद है मॉल मुझे
ना ही ऊँची इमारतें
मुझे पसंद है खुला सा आसमां
फूलों की बगिया, चाँद और तारे
हो नदिया का किनारा,
जहाँ झूमे मन आवारा
मैं ऐसी क्यूँ हूँ, 
मैं ऐसी क्यूँ हूं 
भीड़ से मुझको डर लगता
अकेलापन अच्छा लगता
कभी चहकती चिड़िया सी
कभी शांत जल नदिया का
ना सजना पसंद ना सँवरना पसंद
मुझे मेरे ख्वाबों में बिखरना पसंद
जैसी भी हूँ, खास हूँ
लाजवाब हूँ, अलग हूँ सबसे
सब मेरे अपने हैं और
मैं तन्हा हूँ अपनों में सबसे
किसी का दुःख भी बहुत रुलाए
कोई मीठी याद भी बहुत हँसाए
खोई रहती हूँ यादों में
सुहाने सपने बुनती हूँ
मैं अलग मेरी दुनिया अलग
क्यूँ ऐसा क्यूँ
मैं ऐसी क्यूँ हूँ
कोई तो बताए, मुझको समझाए
मैं ऐसी क्यूँ हूँ
-dr वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi 
===========.....
Title*: बालकनी 

बालकनी  
हर घर में होती है  
बालकनी  
एक ऐसी जगह  
जहाँ से खुलती है विचारों की खिड़की  
दिखाई देता है सारा आसमां  
मिलते हैं मेरे सपनों को पंख  
बतियाने आती है एक नन्ही चिड़िया  
दूर पेड़ पर करतब दिखाती नन्ही गिलहरी  
एक ऐसी जगह  
जहाँ अक्सर आती हैं महिलाएं  
अपने केश संवारने  
युवा अपने फ़ोन पर बतियाने 
बुजुर्ग अपनी जवानी के किस्से सुनाने  
बच्चे आते हैं नयी दुनिया को समझने  
कुछ सामान बाहर फेंकते हैं  


कुछ सामान बाहर फेंकते हैं  
कुछ अन्दर तोड़फोड़ करते हैं  
बालकनी से झाँक - झाँक कर  
राहगीरों को आवाज़ लगाते हैं  
कभी बन्दर, कभी चिड़िया  
खुशी से चिल्लाते हैं  
एक ऐसी जगह  
जहाँ छिपाते हैं कुछ अपने आंसू  
मिटाते हैं कुछ अपनी उदासी  
जलाते हैं कुछ अपना क्रोध  
जब शांत हो जाता है मन  
हल्का सा मुस्काते हैं  
और बतयाते हैं  
एक कप काफी लेकर  
बतायाती हैं साथ उनके बालकनी - - - ||  

डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi 
==============
मेरे महादेव 
रम गया मन मेरा भक्ति में 
ना रहा यकीन अब किसी शक्ति में  
मेरे महादेव बस तुम्ही हो मन में
आस तुम्ही, विश्वास तुम्ही
है समर्पित भाव मेरे, हो आराध्य तुम्ही
टूटने ना देना प्रभु आए भले ही दुःख कितने सही
मेरी किस्मत तुम्हारे हाथ, मेरे खेवैया तुम्ही
इतनी तो कृपा करना भगवान
हर सांस गाए नाम तेरा, हो मंजिल तुम्ही
माता तुम्ही, हो पिता तुम्ही
भ्राता तुम्ही, हो सखा तुम्ही
बनी रहे कृपा आपकी
घड़ी ना आये कोई अब संताप की
पकड़ लो हाथ मेरा, अरदास यही
मेरे महादेव आस तुम्ही, विश्वास तुम्ही
अपनों ने बहुत रुलाया है
बस तुमने मुझे अपनाया है
टूट गई मैं बिखर गई मैं,
अब ना लो और परीक्षा मेरी
अब शरण तुम्हारी हूँ
जीत मेरी लिख दो तुम
दुनिया से मैं हारी हूँ
मेरे महादेव आस तुम्ही, विश्वास तुम्ही
Vandna
-dr वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi 
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(1)

हे प्रभु
कैसी है ये दुनिया बनाई
मुझे तो समझ ना आई
क्या सही क्या बुरा
सब कुछ तुमने ही रचा
एक बीज से कैसे पौधा बनता
इंद्रधनुष आकाश में कैसे बनता
कहीं धरती मिलती आकाश से
कहीं नदियां मिलती समन्दर से
कहीं ऊँची-ऊँची इमारतें
कहीं टेढ़े-मेढ़े रास्ते
जितना मैं सोचूं, उतना ही उलझूं
कैसी ये रीत, कैसी परम्परा
अंत में सब राख हो जाना है
पड़ी रह जायेगी सब माया
साथ नहीं कुछ जाना है
जीवन है क्षणिक बुलबुला जल का
कब फूट जाए किसने जाना है
पाँच तत्व जल, भू, अग्नि, वायु, आकाश
प्राण हैं कहीं, कहीं चले जायेंगे
तेरा-मेरा, जीवन का सब फेरा
आए कितने और कितने सिकन्दर जायेंगे
ये दुनिया एक ढलाव है
जान ले खुद को समय से पहले
आयेगा तेरा भी कल बुलावा है
न आदि है न अंत है
सब शून्य है, शून्य में ही पड़ी सृष्टि है
एक चक्र है ये जीवन, दर्शन उसकी दृष्टि है

मैं कौन हूँ क्या है मेरा ध्येय
ले लो शरण मुझे अब अपनी
नहीं समझना मुझे कुछ भी, बस
शेष न रहे अब कुछ शाप
तेरे दर्शन की प्यास है
अब तेरी ही आस है
परब्रह्म परमेश्वर तू मेरा विश्वास है
हे प्रभु आपको वंदन बारम्बार है।
|| जय महाकाल ||
=======.....====
एक उम्र के बाद 
एक उम्र के बाद 
आता है ऐसा मोड़ भी
मन बेचैन रहता है
 भाता नहीं कुछ भी
सभी बेगाने लगते हैं, 
गैरों में कुछ अपने भी
खो जाती है हँसी कहीं, और मुस्कान भी
कोई बात करे ना करे, चाहे मन का सुकून ये दिल
सब कुछ खो देने पर कुछ पाना भी मुश्किल
जो समय पर ना मिले सब व्यर्थ है
प्रेम और सम्मान ही जीवन का अर्थ है
मन को जब आने लगा अकेलापन
कोयल की कूक मोर का बुलबुलापन
कभी याद आता है खोया बचपन
और वो याद भी बन जाती है तड़पन
जिंदगी को समझना ही क्या
जियो और जीने दो किसी से उलझना ही क्या
खुद में खोना भी जिंदगी है
खुद से मिलना भी जिंदगी है
किसी के काम आए तभी जिंदगी है
किसी रोते को हँसाए तभी जिंदगी है ।
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बारिश कब तुम आओगी ?

बारिश कब तुम आओगी
कितना हमें तड़पाओगी
सूरज कितना दहक रहा है
पत्ता-पत्ता झुलस रहा है
ठंडी फुहारें कब बरसाओगी
बारिश कब तुम आओगी
अम्बर प्यासा, प्यासी धरती
कब इनकी प्यास बुझाओगी
बारिश कब तुम आओगी
सूख गये सब ताल-तलैया
कर दो अपने आँचल की छैया
देख राह नैना तरस गये
सावन में भीगे बरस गये
रुम-झुम करती कब आओगी
बारिश कब तुम आओगी
प्रकृति का श्रृंगार कर दो
हमपर ये उपकार कर दो
पानी की बौछार कर दो
नदियों में संगीत भर दो
भीगे तन और भीगे मन
ऐसी बहारें कब लाओगी
बारिश कब तुम आओगी !
===============....

जब भी मैं अपनी खिड़की खोलूं 
ताजी हवा का झोका आए पूछे कुछ बोलूं 
क्यों हो उदास चलो मेरे साथ 


सुंदर है दुनिया, ये आकाश 
खोलो पंख अपने, निकलकर देखो आकाश
कली खिली गुलाब बनी
आयी चिड़िया सखी बनी
लहरें आई गई अभी और कुछ नही 
फुदकती गिलहरी चहकती चिड़िया,  
कितनी सुंदर प्रकृति 
खो जाओ इनमें, सारे दुखों की हो जाए इति 
किंतु अंदर घुटन 
कोई आंधी लाये, चाहे तूफान ही हो जरुरी 
सफर है अरसों का सफर 
दर्द है कितना इसके अंदर 
सुने जो हाले दिल मेरा 
समझे जो मौन मेरा 
आएगा कब ऐसा सावन 
झूमेगा मन मस्त पावन 
ए बा दल तेरे संग चलूं 
ए नदिया तेरे संग वहू 
कुछ देर थम जा पवन 
नहीं अभी जाने का मन 

डा वन्दना शर्मा 
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उफ़! ये गर्मी*

उफ़! ये गर्मी
जेठ की तपती दोपहरी
इतनी उमस और बेचैनी 
छीन लेती है ऊर्जा सारी
उस पर बिजली की ये मनमानी 
आंखे भी तरसे शीतल छाया को
रूखा सूखा मौसम 
उड़ता उड़ता मौसम 
बरिश को तरसे मन 
कैसे खिलखिलाए मन 

उफ़! ये गर्मी 
कैसे सहती होगी वे मज़दूर औरते 
जो दिन भर खेतों व भट्ठों पर मज़दूरी करती हैं 
और एक मैं हूँ छोटी सी जान 
गिरी गिरी अब गिरी 
जाने कहां कब गिरी 

उफ़! ये गर्मी 
कुछ कम नहीं हो सकती 
थोड़ी सी बरिश रोज नहीं हो सकती 
पर ये तो प्रकृति का नियम है 
कहीं खुशी तो कहीं आँखे नम हैं 
किसी के लिए जो अच्छी है 
किसी के लिए असहनीय बेदम है 
ईश्वर तेरी लीला, तेरे नियम 
दे दे थोड़ी शक्ति थोड़ा संयम
जानती हूँ कुछ नहीं होगा
 शिकायत करने से 
होगा वही जो होना है, पर 
नहीं सही जाती ये गर्मी 
===========....



आओ सुनाऊँ तुम्हें एक कहानी 
ना कोई राजा ना कोई रानी 
जा रहा था एक पथिक अपनी ही धुन में 
ख्वाबों को बुनता हुआ मन ही मन में 
सूरज लगा तेज चमकने 
राही छाया लगा ढूंढने 
चारों तरफ नजर दौड़ाई 
दूर-दूर तक थी ना कोई परछाई 
प्यास से गला सूख रहा था 
साहस पीछे छूट रहा था 
शायद कहीं कुछ टूट रहा था 
ठंडी छाया के लिए तड़प रहा था 
सोच रहा था मन ये उसका 
दे दे कोई पानी का छपका 
काश यहाँ कोई पेड़ होता 
मौसम कुछ और होता 
होती चारों तरफ हरियाली 
झूम उठती डाली-डाली 
आओ हम सब पेड़ लगाएं 
धरती को आने वाले संकट से बचाएं
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कैसे कह दूँ महिला आज सशक्त है 
जब तक एक भी नारी की आँखों में आँसू है 
चीर हरण तो नारी का आज भी होता 
दोषी चाहे कोई भी हो 
दोष लेकिन नारी का ही होगा 
कहीं कथित अपमान, कहीं शारीरिक हिंसा 
नारी से ही क्यों उसका सपना छिनता 
कैसे कह दूँ महिला आज सशक्त है 

कुछ नाम हैं प्रेरणादायक, जिन्होंने परचम फहराया 
उनको भी उंगली पर गिन लो 
कितना खोया, कितना पाया 
इंदिरा नूई, चन्दा कोचर, कल्पना चावला 
प्रतिभा पाटिल, मैरीकॉम या झूही चावला 
बनकर सितारा चमक रही, 
अचम्भित है सारी दुनिया 
बेटे की चाह में होती भ्रूण-हत्या 
वो भी तो है यही दुनिया 
कैसे कह दूँ महिला आज सशक्त है 
जब तक नहीं है स्वयं उसे निर्णय लेने का अधिकार 
कब तक उसका आँचल होगा रहेगा तार-तार 
जब तक नहीं रुकेगी कन्या-भ्रूण हत्या 
कैसे मिलेगा बेटी को जीने का अधिकार 
क्यों बेटी ही प्यार को तरसे 
बेटे पर ही ममता बरसे 
कुछ कहती है उसकी आँखे 
एक बार समझकर देखो 
भर देगी वो खुशियों से घर संसा

- Vandna
10/5/26