bahu puran in Hindi Short Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | बहु पुराण

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बहु पुराण

*'बहु-पुराण' - 

ये कहानी नहीं, हर उस औरत का दस्तावेज है जिसने गाँव की मिट्टी से शहर के अकेलेपन तक का सफर तय किया है।*

शीर्षक: बहु-पुराण*  *-

सुबह से बारिश हो रही थी। मौसम सुहावना हो गया था। ठंडी हवाएं चलने लगी। एक कप कॉफी का लेकर बालकनी में जाकर बैठी नेहा यादों में खो गई जब वो पिछले साल अपनी ननिहाल गई थी और मामी से मिलना हुआ था। बेचारी मामी कितना कुछ झेला उन्होंने। इस दुनिया में सबकी एक कहानी है।

समझ नहीं आता ये कैसा समय चल रहा है। जिसे देखो वो उदास, दुखी नजर आता है। दुख की कैसी हवा चल रही है ये कि जिसको भी छूकर गुजरती है वही दुखी हो जाता है।इस कहानी का पात्र एक दुखी बहू है जो हमेशा अपना बहु-पुराण सुनाती रहती है। जब भी मिलती है किसी से तो शुरू हो जाता है बस सास के अत्याचारों का बखान।गर्मियों की छुट्टियों में नानी के घर जाना हुआ। वैसे तो मेरी मामी बहुत अच्छी हैं लेकिन कुछ दुख तो सभी के भीतर होता है, बस उन्हें सही व्यक्ति नहीं मिलता जिसके सामने अपना दुख साझा कर सकें। दोपहर में जब सो गए, मेरी मामी मेरे पास आईं और अच्छा मौका देख शुरू किया अपना बहु-पुराण। आप सभी पढ़िए और आनंद लीजिए बहुओं की चटपटी बातों का।मेरी मामी शारदा देवी एक संयुक्त परिवार की ग्रामीण परिवेश से। उस समय गाँव में बड़े घर होते थे। घर में बड़ा आँगन होता था। दो कमरे बने, बाकी जमीन खुले नीले आकाश का दीदार करती। रोज न जाने कितने ही किस्सों की गवाह बनती। वह बच्चों के संग शोर भी मचाती। बूढ़े-बूढ़ी सास-ससुर, संग बतयाती और युवा वर्ग जब थका-हारा काम से आता उसका पलके बिछाए स्वागत करती।उस आँगन की गोद में सभी को सुकून मिलता। शारदा की शादी हो गई एकल परिवार में। घर तो बहुत बड़ा था लेकिन रहन-सहन शहर जैसा। मतलब बे परवाही बिलकुल बंद। साफ-सफाई पर फोकस करना। ये मत खाओ नुक्सान देगा। वो मत खाओ बीमार हो जाओगे। अधिक हाइजीन की आदत भी बोरिंग बना देती है जिंदगी को।मैंने मामी को कुरेदते हुए पूछा, "आगे क्या हुआ मामी?" मामी ने अपना चश्मा उतारा, अपनी आँख से आँसू पोंछते हुए बोलीं - "तुझे क्या बताऊँ लाली। मेरे साथ क्या हुआ? तू तो शहर में रहती है अपने पति के साथ। ससुराल में रहती तो पता चलता। मैं जब ब्याह कर आई थी, शुरू में तो मेरा जी ही ना लगा। मायके में भले ही जंगल जाती थी। चारा काटती, पशुओं को चारा डालती लेकिन साँझ होते ही घर में चौपाल लग जाती। माँ दिया जला देती और हम सारे भाई-बहन वहीं आँगन में बैठते। यहाँ तो कोई बात करने वाला ही नहीं है। किससे चुगली करूँ, किससे लडूँ। वहाँ तो पूरे मोहल्ले की खबर रहती थी। और यहाँ .... सुनेगी तो तेरा कलेजा मुँह को आ जायेगा। अरी क्या बताऊँ, तेरी माँ तो पढ़ाई-लिखाई में लगी रहती थी, तेरे मामा दूसरे शहर चले जाते थे नौकरी करने।और तेरी नानी आचार-मठरी बनाने में लगी रहती। ठाली तो बैठा ही ना जाये था उनसे। कभी हाथ से ही सिलाई करती, कभी बच्चों के लिए स्वेटर बुनती। वहाँ तो मेरा पेट भी ना भरे था। मुझे तो सुबह चटनी गुड़ के साथ बासी रोटी खाने की आदत थी। पूरा ढेला गुड़ का खा जाती थी और उसपर एक लोटा छाछ का मारती। और यहाँ नाश्ते में क्या बनाते हैं - नमकीन, बिस्किट, पोहा। मुझे तो कुछ कहते ना बनता।तेरे मामा ने शहर में एक कमरा ले लिया था। तेरी माँ मुझे वहाँ तेरे मामा के पास छोड़ आई थी कि शहर में मन लग जाएगा। जब मेरा अन्नू होने को था ना तो क्या बताऊँ, मुझे लौकी खाने का मन बिलकुल ना होते था। एक आंटी जी थीं पड़ोस में, बेचारी बड़ी भली थीं। जब मेरे दर्द शुरू हुआ तो बैलगाड़ी में डालकर दाई के पास आंटी जी ले गईं। तेरी नानी तो गाँव में थीं। उन्हीं अम्मा-आंटी जी ने मेरा ख्याल रखा। अरी जच्चा और बच्चा को चाय कौन देता है, पर तेरी माँ ने मुझे भी चाय पिलाई और मेरे बच्चे को भी। बेचारा भूख से रो रहा था। पर नाशपिटे किसी मुए ने दूध भी लाकर ना दिया। वो तो भला हो ऊपर वाले का बच्चों के भाग से शहर आ गई।ऊपर वाला भी अंधा है क्या उसे दिखता ना है जो थोक में दुख झोली में डाल रहा है। मेरे जी से पूछ कितना जलता है जी। तेरी माँ के चारों बच्चों की शादी हो गई और मेरे एक की भी ना हुई। बहुत दिल दुखता है, किससे कहूँ -तेरे मामा भी मुझे छोड़कर चले गए पिछले साल। अच्छा हुआ चले गए वरना किसे मुँह दिखाते। दोनों लड़के साँड हुए जा रहे हैं। अभी तक किसी का ब्याह ना हुआ। बड़ा भी चालीस का हो गया। टेम पे ब्याह हो जाता ना तो मैं भी पोते खिलाती। हाय रे मेरा तो नसीब ही फूट गया।"ऐसा कहते-कहते मामी जोर से रोने लगीं। मैंने उन्हें चुप कराया और पानी पीने को दिया। "मामी चुप हो जाओ। अब कर भी क्या सकते हैं। विधि के विधान को कौन बदल पाया है। देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाई। 'कान के झुमके' कैसे हैं? लग तो असली रहे हैं, सच्ची बता तभी लूँगी। अरे मामी बड़ी तेज नजर है  आपकी। हाँ 2 ग्राम के हैं। मतलब दो ग्राम सोना बाकी नकली। अच्छा ला तो मैं रख लेती हूँ। जा तू रसोई देख और दो कप चाय बना ला। पगली कहीं की ।"---डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi