Ishq ka Ittefaq - 1 in Hindi Love Stories by Alok books and stories PDF | Ishq ka Ittefaq - 1

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Ishq ka Ittefaq - 1

शहर की साफ और चौडी सडक पर कबीर मेहरा की नई' मेबैक' किसी काले चीते की तरह हवा से बातें कर रही थी. कबीर मेहरा—शहर का वो नाम जिससे बिजनेस के गलियारों में सन्नाटा पसर जाता था. उसके लिए वक्त ही खुदा था और उसे बर्बाद करना कबीर की डिक्शनरी में पाप था. अपनी गाडी की पिछली सीट पर बैठा कबीर अपने आईपैड पर कुछ ग्राफ देख रहा था,

पर उसका ध्यान बार- बार घडी की सुइयों पर जा रहा था. उसे आज तीन दिन की एक बेहद जरूरी इंटरनेशनल बिजनेस ट्रिप के लिए निकलना था। थोडा और तेज चलाओ, मुझे ठीक बीस मिनट में एयरपोर्ट के वीआईपी लाउंज में होना है।.


कबीर ने रूखेपन से ड्राइवर को आदेश दिया. तभी, अचानक एक अंधे मोड पर सब कुछ पलट गया. एक छोटा सा पिल्ला, न जाने कहाँ से सडक के ठीक बीचों- बीच आ गया और डर के मारे वहीं जम गया.

कबीर ने जैसे ही सामने देखा, उसकी आँखें फैल गईं—" ब्रेक मारो! वह जोर से चिल्लाया. लेकिन ब्रेक लगने से पहले ही, एक गुलाबी स्कूटी पर सवार लडकी—सिया—किसी तूफान की तरह बीच सडक पर आ गई. उसने अपनी जान की परवाह किए बिना उस बेजुबान को उठाया और दूसरी तरफ मुडने की कोशिश की.

चर्रर्रर्रर्रर.

टायरों के घिसटने की तीखी आवाज ने आसपास के सन्नाटे को चीर दिया. कबीर की करोडों की लग्जरी कार के टायर सडक को झुलसाते हुए ठीक सिया के पास जाकर रुके. जोरदार झटका लगा और स्कूटी का संतुलन बिगड गया. सिया सडक के किनारे जा गिरी. उसकी स्कूटी का अगला हिस्सा कबीर की गाडी के पिछले कांच और लाइट से जा टकराया.

कचचचच.

कांच के टूटने की आवाज सुनकर कबीर का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया. वह झटके से गाडी से बाहर निकला. उसने अपना कीमती कोट झाडा और सीधे सिया की तरफ झपटा, जो अभी भी दर्द में जमीन पर बैठी थी. दिमाग घर पर छोड आई हो क्या? दिखाई नहीं देता कितनी महँगी गाडी चल रही है?

तुम्हारी इस खटारा स्कूटी की कीमत मेरी गाडी के एक कांच के बराबर भी नहीं है! सिया ने अपने छिले हुए घुटने को सहलाया और फिर सिर उठाकर कबीर की तरफ देखा.

उसकी आँखों में आंसू नहीं थे, बल्कि एक ऐसी आग थी जिसे देखकर कबीर एक पल के लिए ठिठक गया. वह खडी हुई और धूल झाडते हुए बोली, गाडी की कीमत तो बहुत अच्छे से पता है आपको, पर क्या आपको एक जान की कीमत पता है?

अगर इस मासूम को कुछ हो जाता तो? आपके पास पैसा बहुत होगा, पर इंसानियत के नाम पर आप बिल्कुल गरीब हैं!
जुबान संभाल के बात करो लडकी! तुम जानती नहीं मैं कौन हूँ, कबीर उसकी तरफ एक कदम और बढा। जो भी हो, अपनी ये महँगी गाडी संभाल के रखो, क्योंकि अगली बार शायद कोई कुत्ता नहीं, तुम्हारी अपनी ये बदतमीजी तुम्हें ले डूबेगी! सिया ने उसे करारा जवाब दिया और पिल्ले को अपनी बाहों में समेट कर वहाँ से चली गई. कबीर सन्न खडा रह गया. उसने गुस्से में अपनी गाडी का टायर पीटा.

उसे क्या पता था कि जिस लडकी को वो आज सडक पर छोड आया है, वही उसकी जिंदगी के सुकून को आग लगाने वाली है. तीन दिन बाद: मेहरा मेंशन में धमाकातीन दिन की थका देने वाली ट्रिप के बाद कबीर वापस लौटा. उसका दिमाग अभी भी बिजनेस डील के तनाव में था. जैसे ही उसने मेहरा मेंशन के आलीशान दरवाजे के अंदर कदम रखा,

उसे घर में एक अजीब सी शांति महसूस हुई. वह सीधे अपनी दादी के कमरे की तरफ गया. दादी उसके लिए उसकी पूरी दुनिया थीं. कमरे का दरवाजा थोडा खुला था. कबीर अंदर जाने ही वाला था कि उसने किसी की हँसने की आवाज सुनी—वही आवाज, जिसने तीन दिन से उसे चैन की नींद सोने नहीं दिया था. कबीर ने जैसे ही दरवाजा पूरा खोला,

उसके पैरों तले जमीन खिसक गई.सामने वही लडकी—सिया—बडे प्यार से उसकी दादी के पास बैठी थी। तुम यहाँ क्या कर रही हो? कबीर की दहाड से पूरा कमरा गूँज उठा. सिया ने चौंक कर पीछे देखा. कबीर को देखते ही उसका चेहरा सफेद पड गया, पर उसने तुरंत खुद को संभाला। सिक्योरिटी! कबीर पागलों की तरह चिल्लाया. सिक्योरिटी, अंदर आओ!

अगले ही पल दो तगडे गार्ड्स कमरे में दाखिल हुए. कबीर ने सिया की तरफ इशारा करते हुए गरजा, इस लडकी को अभी के अभी गर्दन पकडकर बाहर निकालो! इसकी हिम्मत कैसे हुई मेहरा मेंशन में कदम रखने की?

जैसे ही गार्ड्स सिया की तरफ बढे, दादी का हाथ बिस्तर पर जोर से लगा. रुक जाओ! दादी की आवाज में ऐसी कडक थी कि गार्ड्स वहीं जम गए। दादी, आप नहीं जानतीं, यह लडकी—" कबीर बोलना ही चाह रहा था कि दादी ने उसे रोक दिया. दादी की आँखों में नमी थी पर आवाज में जिद.

उन्होंने कबीर की तरफ देखते हुए कहा, कबीर. अगर तू मुझे अपनी दादी मानता है, अगर तू जरा सी भी मेरी इज्जत करता है, तो यह लडकी यहीं रहेगी. यह कहीं नहीं जाएगी. कबीर सन्न रह गया. पर दादी, यह चालबाज है! खामोश कबीर! दादी ने हाथ हवा में उठाया. कोई इस लडकी को हाथ नहीं लगाएगा. डॉक्टर मल्होत्रा ने इसे मेरी फिजियोथेरेपी के लिए भेजा है.
और अगर तूने इसे बाहर निकाला, तो समझ लेना कि तूने अपनी दादी को भी इस घर से बाहर निकाल दिया. बोल, क्या तू चाहता है कि मैं चली जाऊँ?

पूरे कमरे में सन्नाटा पसर गया. कबीर की मुट्ठियाँ भिंच गईं. उसकी रगों में खून उबल रहा था, पर दादी के आंसुओं के आगे वो हमेशा कमजोर पड जाता था.
उसने गार्ड्स को बाहर जाने का इशारा किया. कबीर धीरे- धीरे चलकर सिया के एकदम पास गया. सिया की धडकनें तेज थीं पर उसकी नजरें झुकी नहीं थीं.

कबीर ने उसके कान के पास झुककर बहुत धीमी, बर्फीली और जहरीली आवाज में कहा. आज मैं अपनी दादी की वजह से चुप हूँ, पर इसे अपनी जीत मत समझना. मेहरा मेंशन में कदम रखना तुम्हारी जिंदगी की सबसे बडी भूल साबित होगा.

याद रखना. अब तुम्हारी उल्टी गिनती शुरू होती है. मैं तुम्हें इस घर से निकालूँगा नहीं, बल्कि तुम्हें भागने पर मजबूर कर दूँगा। इतना कहकर कबीर वहाँ से पैर पटकता हुआ निकला और अपने कमरे में जाकर दरवाजा इतनी जोर से बंद किया कि पूरा मेंशन दहल उठा. सिया को अहसास हो गया था।
कि अब उसका सामना एक इंसान से नहीं, बल्कि एक जख्मी शेर से है.


( __टीजर__ ) (अगले अध्याय के लिए):__ अगले भाग में देखिए, कबीर सिया के लिए ऐसा' पहला टास्क' तैयार करता है जिसे पूरा करना नामुमकिन है. क्या" सिया कबीर की नफरत का सामना कर पाएगी या पहली ही चुनौती में हार मान लेगी? /__ जानने के लिए देखिए अगला अध्याय__????