मेहरा मेंशन की सुबह आज किसी भारी पत्थर की तरह उगी थी. सूरज की किरणें खिडकियों से छनकर अंदर तो आ रही थीं, लेकिन घर के माहौल में जो एक चमक हुआ करती थी, वो गायब थी. कबीर अपने कमरे की बालकनी में खडा नीचे बगीचे को देख रहा था. कल रात की उस पार्टी की गूँज अब भी उसके कानों में शोर मचा रही थी.
कबीर के चेहरे पर आज वो पुराना आत्मविश्वास नहीं था, बल्कि एक अजीब सी कशमकश थी. उसका मन उसे बार- बार कह रहा था कि उसने गलत किया, पर उसका ईगो, उसका घमंड अब भी उस पर हावी था। एक मामूली डॉक्टर की इतनी हिम्मत कि मुझे नीचा दिखाकर चली जाए?
कबीर ने अपने हाथ की घडी को कसकर पकडते हुए खुद से कहा.
उसे इस बात का दुख नहीं था कि सिया चली गई, उसे इस बात का गुस्सा था कि सिया ने उसे सबके सामने' छोटा' साबित कर दिया था. कबीर मेहरा को हारना पसंद नहीं था, और सिया का वो बेबाक अंदाज उसे एक हार की तरह चुभ रहा था.
तभी कमरे के दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई. कबीर ने पलटकर देखा, सुनील खडा था. सुनील के हाथ में कुछ कागजात थे.
साहब, वो लखनऊ वाली फाइल. सुनील की आवाज में झिझक थी. कबीर ने इशारा किया और सुनील ने फाइल मेज पर रख दी. कबीर ने फाइल खोली, पर उसका ध्यान उन पन्नों पर नहीं था. उसे तो बस वो चेहरा याद आ रहा था जब सिया ने नम आँखों से उसे देखा था। सुनील, क्या तुम्हें लगता है कि वो वाकई दागदार है?
कबीर ने अचानक पूछा. सुनील एक पल के लिए रुक गया, फिर बोला, साहब, जितना मैंने देखा है, वो लडकी काम की पक्की थी. बाकी अतीत तो किसी का भी कुछ भी हो सकता है. पर वो जिस तरह से कल रात यहाँ से निकली, वो किसी गुनहगार का तरीका नहीं था.
गुनहगार छुपते हैं साहब, वो तो अपना स्वाभिमान लेकर गई है। कबीर को सुनील की ये बात चुभ गई. स्वाभिमान? क्या एक मामूली लडकी का स्वाभिमान कबीर मेहरा की साख से बडा हो सकता है?
कबीर ने गुस्से में फाइल बंद कर दी. मुझे सफाई नहीं चाहिए सुनील. मुझे सच चाहिए. जाओ और पता लगाओ कि वो कहाँ गई है. मुझे उसे वापस नहीं लाना, मुझे बस ये जानना है कि क्या मैंने किसी सांप को पाला था या वाकई कोई हीरा खो दिया है। इधर, मेंशन के दूसरे हिस्से में काम्या बुआ अपने कमरे में बडी सुकून की नींद लेकर उठी थीं. उनके लिए आज की सुबह किसी उत्सव से कम नहीं थी. उन्होंने अपनी खास सहेली मिसेज खन्ना को फोन लगाया.
" अरे सुन रही हो!
वो कलंक तो cut गया. मेंशन की हवा अब जाकर साफ हुई है. कबीर थोडा उखडा हुआ है पर धीरे- धीरे सब ठीक हो जाएगा। काम्या बुआ को लग रहा था कि उन्होंने बाजी मार ली है, पर वो इस बात से अनजान थीं कि घर के सबसे बडे स्तंभ, गायत्री दादी की हालत धीरे- धीरे बिगड रही थी.
गायत्री दादी ने सुबह से पानी की एक बूंद तक नहीं पी थी. वो अपने बिस्तर पर आँखें बंद किए लेटी थीं, पर वो सो नहीं रही थीं. बलराज दादाजी उनके पास बैठे उनका हाथ सहला रहे थे. गायत्री, जरा देखो तो, कबीर आया है तुमसे मिलने, दादाजी ने भारी आवाज में कहा.
कबीर कमरे में दाखिल हुआ. उसने दादी का हाथ पकडना चाहा, पर दादी ने अपना हाथ धीरे से खींच लिया। दादी, दवा का वक्त हो गया है, कबीर ने नरमी से कहा. दादी ने आँखें खोलीं, उनकी आँखों में कबीर के लिए एक अजीब सी अजनबियत थी. दवा तो जहर बन जाती है कबीर, जब उसे देने वाले हाथ बेईमान हो जाएं. तूने उस बच्ची के साथ जो किया, उसके बाद मुझे तेरी दी हुई किसी चीज पर भरोसा नहीं रहा.
दादी की ये बात कबीर के कलेजे को चीर गई. उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसकी दादी, जो उसे अपनी जान से ज्यादा चाहती थीं, उसके लिए ऐसे शब्द इस्तेमाल करेंगी. मेंशन से बहुत दूर, दिल्ली के एक शोर- शराबे वाले बस स्टैंड पर सिया एक बेंच पर बैठी थी. उसका चेहरा फीका पड गया था,
पर उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे. उसने अपने बैग से अपना मोबाइल फोन निकाला. कबीर के कई मिस्ड कॉल्स और मैसेज थे— कुछ गुस्से वाले, कुछ सवालिया. सिया ने एक पल के लिए उन मैसेजेस को देखा और फिर उसके होंठों पर एक सर्द मुस्कान आई.
उसने बिना सोचे सिम कार्ड निकाला और उसे जमीन पर फेंककर अपने सैंडल से कुचल दिया। अब कोई मेहरा खानदान, कोई कबीर और कोई अतीत मुझे नहीं ढूँढ पाएगा, सिया ने मन ही मन खुद से वादा किया. उसने बस का टिकट लिया जो उसे एक अनजान छोटे से शहर की तरफ ले जाने वाला था।
वो अब किसी आलीशान महल की फिजियोथेरेपिस्ट नहीं थी, वो अब सिर्फ एक आजाद लडकी थी जिसे अपनी जिंदगी को फिर से शून्य से शुरू करना था.
बस जब चलने लगी, तो सिया ने खिडकी से बाहर देखा. उसे वो मेंशन याद आया, वो बगीचा, दादी की वो हंसी. और कबीर का वो पत्थर जैसा चेहरा. उसने एक लंबी सांस ली और आँखें बंद कर लीं. प्यार? नहीं, प्यार के लिए अभी उसकी जिंदगी में कोई जगह नहीं थी.
उसे तो बस जिंदा रहना था. शाम होते- होते कबीर फिर से अपने ऑफिस में था. काम में उसका मन नहीं लग रहा था. सुनील वापस आया, उसके चेहरे पर मायूसी थी.
" साहब, उसका सिम कार्ड बंद आ रहा है. लोकेशन कश्मीरी गेट के पास मिली थी, पर उसके बाद कोई सुराग नहीं. वो जैसे हवा में गायब हो गई है। कबीर ने अपनी कुर्सी पीछे की तरफ झुकाई और छत की तरफ देखने लगा. गायब हो गई? इतनी आसानी से? कबीर को गुस्सा आ रहा था— सिया पर भी और खुद पर भी. उसे लगा था कि सिया रोएगी, गिडगिडाएगी या शायद वापस आने की कोशिश करेगी. पर उसने तो रास्ता ही बदल लिया. कबीर के लिए ये एक नई चुनौती थी। सुनील, मुझे वो फाइल चाहिए जो सिया ने दादी के लिए बनाई थी.
उसमें उसकी लिखाई और उसके नोट्स होंगे. मुझे समझना होगा कि वो लडकी सोचती कैसे है, कबीर ने कहा. सुनील ने वो फाइल दी. कबीर ने पन्ने पलटना शुरू किया. हर पन्ने पर सिया की मेहनत दिख रही थी. छोटे- छोटे नोट्स, दादी की डाइट का ध्यान, उनके पैरों की मालिश का तरीका. कबीर को पहली बार लगा कि जिस लडकी को वो सिर्फ एक कर्मचारी समझ रहा था,
वो इस घर की रग- रग में समा चुकी थी. रात गहरी होती जा रही थी. मेहरा मेंशन में आज रात संगीत नहीं, सिर्फ खामोशी की गूँज थी. काम्या बुआ अपने कमरे में चैन से सो रही थीं, पर कबीर की नींद उड चुकी थी. वो अब भी उस टूटे हुए सिम कार्ड और सिया के आखिरी खत के बारे में सोच रहा था.
प्यार तो बहुत दूर की बात थी, अभी तो कबीर के मन में सिर्फ और सिर्फ एक ही सवाल था—" क्या वाकई मैं गलत था? ये सवाल कबीर मेहरा को सोने नहीं दे रहा था. कहानी का ये नया मोड अब एक ऐसी राह पर जा रहा था जहाँ नफरत की आग थी, टूटे हुए सपने थे और एक ऐसा सफर था जिसका अंजाम कोई नहीं जानता था. कबीर ने ठान लिया था
कि वो सिया को ढूँढेगा, पर इसलिए नहीं कि उसे प्यार था, बल्कि इसलिए क्योंकि उसे अपने सवालों के जवाब चाहिए थे. सिया, जो अब उस पुरानी बस में बैठी ऊंघ रही थी, उसे नहीं पता था कि उसका ये सफर उसे कहाँ ले जाएगा.
पर एक बात तय थी, मेहरा खानदान की वो' भगोडी' डॉक्टर अब किसी के सामने झुकने वाली नहीं थी. अगली सुबह कबीर ने फैसला लिया कि वो खुद लखनऊ जाएगा. उसे उस' स्कैंडल' की जड तक पहुँचना था. उसे जानना था कि वो कौन लोग थे जिनके नाम से सिया का गला सूख जाता था.
कबीर को ये नहीं पता था कि लखनऊ में उसका सामना सिर्फ सिया के अतीत से नहीं, बल्कि अपनी खुद की सोच की गंदगियों से भी होगा.
क्या कबीर लखनऊ पहुँचकर सिया की मासूमियत का सबूत ढूँढ पाएगा?
क्या सिया को नए शहर में कोई नई पहचान मिलेगी?
क्या काम्या बुआ कबीर को रोकने के लिए कोई नई चाल चलेंगीज्ञ?
क्या कबीर लखनऊ की उन गलियों में सिया का सच ढूंढ पाएगा ?
क्या सिया खुद को इस अंधेरे से बाहर निकाल पाएगी? कहानी अब एक ऐसे मोड पर है जहाँ हर कदम पर एक नया राज छिपा है.
जुडे रहिये हमारे साथ. अगला अध्याय और भी धमाकेदार होने वाला है!
क्या कबीर का ईगो उसे सिया की मासूमियत कभी देखने देगा ?
क्या सिया अपनी नई पहचान बनाने में कामयाब होगी या अतीत उसे फिर ढूंढ लेगा ?
क्या गायत्री दादी की बिगडती हालत कबीर को पत्थर से फिर इंसान बना पाएगी ?
काम्या बुआ की अगली चाल मेहरा मेंशन में क्या नया तूफान लाएगी ?
दोस्तों, इस कहानी के हर शब्द को मैंने अपनी भावनाओं और कडी मेहनत से पिरोया है. एक- एक दृश्य को सोचने और उसे लिखने में बहुत वक्त और दिल लगता है. मुझे इस सफर में आप सबके साथ और प्यार की बहुत जरूरत है. अगर आपको मेरी यह कोशिश अच्छी लग रही है, तो कृपया अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें. आपका एक लाइक, कमेंट और फॉलो मुझे और भी बेहतर लिखने की प्रेरणा देता है. आपके प्यार के बिना यह कहानी अधूरी है.
अगला अध्याय और भी धमाकेदार है जुड़े रहे हमारे साथ,,,,,,,